सुभाष चंद्र बोस की पत्नी के बारे में और एक कहानी: वे भारत क्यों न आ सकीं
सुभाष चंद्र बोस, जिन्हें हम प्रेम से नेताजी कहते हैं, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे तेजस्वी और साहसी नेताओं में से एक थे। उनके जीवन के कई पहलू रहस्य और त्याग से भरे हुए हैं। जहां एक ओर उनका राजनीतिक जीवन देशभक्ति, संघर्ष और बलिदान का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर उनका निजी जीवन भी उतना ही संवेदनशील और मार्मिक था। बहुत कम लोग जानते हैं कि सुभाष चंद्र बोस की पत्नी का नाम एमिली शेंकल (Emilie Schenkl) था।
एमिली शेंकल कौन थीं?
एमिली शेंकल का जन्म 1910 में ऑस्ट्रिया के वियना शहर में हुआ था। वे एक साधारण, शिक्षित और संवेदनशील परिवार से थीं। सुभाष चंद्र बोस से उनकी मुलाकात 1934 में हुई, जब बोस इलाज के लिए और अपनी पुस्तक लिखने के सिलसिले में यूरोप गए थे। उस समय वे ब्रिटिश सरकार द्वारा कई बार जेल भेजे जा चुके थे और स्वास्थ्य ठीक नहीं था।
वियना में सुभाष बाबू को एक टाइपिस्ट की आवश्यकता थी, जो उनकी अंग्रेज़ी पांडुलिपि टाइप कर सके। किसी परिचित के माध्यम से एमिली शेंकल उनसे मिलीं। धीरे-धीरे काम के दौरान दोनों के बीच आपसी सम्मान, समझ और स्नेह का रिश्ता विकसित हुआ। दोनों अलग-अलग संस्कृतियों और देशों से थे, लेकिन विचारों की गहराई और संवेदनशीलता ने उन्हें एक-दूसरे के करीब ला दिया।
कहा जाता है कि 1937 में दोनों ने एक निजी समारोह में विवाह कर लिया। उस समय भारत में स्वतंत्रता संग्राम तेज़ हो रहा था और बोस का जीवन निरंतर संघर्षों से भरा था। इस कारण उन्होंने अपने विवाह को सार्वजनिक नहीं किया। 1942 में उनकी एक बेटी हुई, जिसका नाम अनिता बोस रखा गया। आज वे एक प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री हैं।
वे भारत क्यों न आ सकीं?
यह प्रश्न बहुत लोगों के मन में उठता है कि नेताजी की पत्नी एमिली शेंकल भारत क्यों नहीं आईं?
इसके पीछे कई कारण थे:
राजनीतिक परिस्थितियाँ और रहस्य
सुभाष चंद्र बोस का जीवन अत्यंत गोपनीय और जोखिम भरा था। वे ब्रिटिश सरकार की नज़र में सबसे बड़े विद्रोही थे। 1941 में वे भारत से गुप्त रूप से निकलकर जर्मनी और फिर जापान पहुंचे। उनके जीवन में लगातार खतरा था। ऐसे में एमिली और उनकी बेटी की सुरक्षा एक बड़ी चिंता थी।
द्वितीय विश्व युद्ध की स्थिति
उस समय यूरोप में द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था। ऑस्ट्रिया और जर्मनी युद्ध की चपेट में थे। यात्रा करना अत्यंत कठिन और जोखिम भरा था। भारत आना लगभग असंभव जैसा था।
नेताजी की कथित मृत्यु और अनिश्चितता
1945 में ताइवान में विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु की खबर आई। हालांकि उनकी मृत्यु आज भी एक रहस्य है, लेकिन उस समय यही समाचार विश्वभर में फैल गया। इस खबर के बाद एमिली शेंकल एक तरह से अकेली पड़ गईं। वे अपनी छोटी बेटी के साथ ऑस्ट्रिया में ही रहीं।
भारत में सामाजिक और राजनीतिक स्थिति
स्वतंत्रता के बाद भारत में नेताजी की भूमिका और उनकी मृत्यु को लेकर कई विवाद और राजनीतिक मतभेद रहे। एमिली शेंकल का विवाह भी लंबे समय तक सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं किया गया। संभवतः इस कारण भी वे भारत आने में संकोच करती रहीं।
व्यक्तिगत स्वाभिमान और परिस्थितियाँ
एमिली शेंकल ने जीवनभर सादगी और आत्मसम्मान के साथ जीवन बिताया। उन्होंने कभी भी नेताजी के नाम का उपयोग निजी लाभ के लिए नहीं किया। वे अपनी बेटी की परवरिश और अपने जीवन में व्यस्त रहीं।
एक मार्मिक कहानी: “अधूरी प्रतीक्षा”
वियना की ठंडी शाम थी। खिड़की के बाहर बर्फ गिर रही थी। एमिली शेंकल अपनी छोटी बेटी अनिता को गोद में लिए बैठी थीं। उनके सामने मेज पर सुभाष बाबू की एक पुरानी तस्वीर रखी थी। तस्वीर में वही तेजस्वी आँखें, वही दृढ़ चेहरा।
“मामा, पापा कब आएंगे?” छोटी अनिता ने मासूमियत से पूछा।
एमिली कुछ क्षण चुप रहीं। उनकी आँखों में नमी तैर गई। उन्होंने मुस्कुराने की कोशिश की—
“तुम्हारे पापा बहुत बहादुर हैं। वे अपने देश को आज़ाद कराने गए हैं।”
उनके मन में 1934 की वह पहली मुलाकात घूम गई। जब एक गंभीर, लेकिन विनम्र भारतीय युवक ने उनसे कहा था—
“मुझे अपनी किताब पूरी करनी है। क्या आप मेरी मदद करेंगी?”
धीरे-धीरे किताब के पन्नों के बीच एक नया रिश्ता जन्मा। सुभाष बाबू अक्सर भारत की बातें करते—गंगा, हिमालय, स्वतंत्रता, और अपने लोगों के संघर्ष की कहानियाँ। एमिली उन कहानियों को सुनते-सुनते भारत को महसूस करने लगी थीं।
एक दिन सुभाष ने उनका हाथ थामकर कहा था—
“मेरा जीवन आसान नहीं है। मुझे अपने देश के लिए सब कुछ त्यागना होगा। क्या तुम इस राह में मेरे साथ चल सकोगी?”
एमिली ने शांत स्वर में उत्तर दिया था—
“जहाँ आपका विश्वास है, वहीं मेरा साथ है।”
फिर वह दिन आया जब सुभाष को जाना था। वे जानते थे कि आगे का रास्ता खतरनाक है। विदा लेते समय उन्होंने छोटी अनिता को गोद में उठाया, माथे को चूमा और एमिली की ओर देखा।
“अगर मैं लौट न सका, तो हमारी बेटी को बताना कि उसका पिता अपने देश से बहुत प्रेम करता था।”
एमिली ने उनके हाथ कसकर पकड़ लिए। लेकिन इतिहास को कुछ और ही मंजूर था।
1945 की एक सुबह खबर आई—विमान दुर्घटना… सुभाष चंद्र बोस नहीं रहे।
यह समाचार सुनकर एमिली का संसार जैसे थम गया। परंतु उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने आँसू पोंछे और अपनी बेटी को सीने से लगा लिया। अब वही उनका संबल थी।
कई वर्षों बाद, जब भारत स्वतंत्र हुआ, कुछ लोगों ने उनसे भारत आने का निमंत्रण दिया। परंतु उनके मन में संकोच था। क्या भारत उन्हें स्वीकार करेगा? क्या वे उस भूमि पर जाकर अपने अतीत की पीड़ा को सह पाएंगी?
उन्होंने सोचा—
“जिस भारत से सुभाष प्रेम करते थे, वह अब स्वतंत्र है। मेरा कार्य उनकी स्मृति को संजोए रखना है, न कि प्रसिद्धि पाना।”
उन्होंने ऑस्ट्रिया में रहकर ही सादा जीवन चुना। अनिता बड़ी हुईं, पढ़-लिखकर एक सम्मानित अर्थशास्त्री बनीं। वे समय-समय पर भारत आती रहीं, अपने पिता की स्मृतियों से जुड़ती रहीं।
एमिली कभी-कभी खिड़की से बाहर देखते हुए सोचतीं—
“काश, मैं उस देश को देख पाती, जिसके लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया।”
परंतु शायद उनका भारत आना आवश्यक नहीं था। उनका प्रेम, उनका त्याग और उनकी प्रतीक्षा ही उनके जीवन की सबसे बड़ी कहानी बन गई।
निष्कर्ष
एमिली शेंकल का जीवन त्याग, धैर्य और सादगी का प्रतीक था। वे भारत इसलिए नहीं आ सकीं क्योंकि परिस्थितियाँ, युद्ध, राजनीतिक अनिश्चितता और व्यक्तिगत संकोच उनके मार्ग में बाधा बने। उन्होंने कभी शिकायत नहीं की। वे चुपचाप अपने पति की स्मृति को संजोए रहीं।
सुभाष चंद्र बोस का जीवन जहाँ क्रांति की ज्वाला था, वहीं एमिली शेंकल का जीवन शांत दीपक की तरह था—जो बिना शोर किए, अंत तक जलता रहा।
उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि स्वतंत्रता के महान संघर्ष के पीछे कई अनकही कहानियाँ और मौन बलिदान छिपे होते हैं।