ड्राइंग रूम के पुराने सोफे पर बैठी सुमित्रा देवी अपनी उंगलियों में फंसी माला को बड़ी तेजी से फेर रही थीं। कमरे में अगरबत्ती का धुआं किसी भारी कोहरे की तरह तैर रहा था। नेहा रसोई में चाय की ट्रे सजा रही थी, पर उसके कानों में माला के दानों के टकराने की आवाज़ किसी अदृश्य खतरे की घंटी जैसी लग रही थी।
नेहा ने चाय की प्याली मेज पर रखी। सुमित्रा जी ने आँखें नहीं खोलीं।
"चाय पी लीजिए माँ जी।" नेहा ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा।
सुमित्रा जी की माला रुकी। उन्होंने आँखें खोलीं और बड़ी बेरुखी से नेहा के सपाट पेट की तरफ देखा। "चाय में वो स्वाद नहीं रहा नेहा, जो हुआ करता था। शायद इसलिए क्योंकि बनाने वाली का मन कहीं और है।"
नेहा ने नज़रें झुका लीं। "नहीं माँ जी, ऐसा नहीं है। बस थोड़ा सिरदर्द था।"
"सिरदर्द तो मुझे है नेहा। पिछले तीन सालों से। जब मोहल्ले की औरतें पूछती हैं कि सुमित्रा, दादी कब बन रही है? तो मेरे पास कोई जवाब नहीं होता।"
नेहा ने गहरी सांस ली। "डॉक्टर ने कहा है कि सब सामान्य है। हम कोशिश तो कर रहे हैं।"
"कोशिश?" सुमित्रा जी ने उपहास में अपनी भौहें सिकोड़ीं। "कोशिश और नतीजे में फर्क होता है। मुझे खानदान का चिराग चाहिए। सुमित के पिता की आखिरी इच्छा यही थी कि उनके हाथ में पोता हो। अब वो तो रहे नहीं, पर क्या मैं भी बिना पोते का मुंह देखे चली जाऊंगी?"
तभी दरवाजे की बेल बजी। सुमित दफ्तर से थका-हारा लौटा था। उसने अपना बैग सोफे पर पटका और पानी के लिए हाथ बढ़ाया।
"सुमित, तुम आ गए? देखो अपनी पत्नी को, इसे अपनी जिम्मेदारियों का ज़रा भी अहसास नहीं है।" सुमित्रा जी ने मोर्चा सुमित की तरफ मोड़ दिया।
सुमित ने पानी पीते हुए नेहा की तरफ देखा, जिसकी आँखों के किनारे लाल हो रहे थे। "माँ, प्लीज। मैं अभी आया हूँ। आते ही शुरू मत हो जाया कीजिए।"
"क्यों न होऊं? कल मिश्रा जी के घर पोता हुआ है। पूरे मोहल्ले में मिठाइयां बंटी हैं। और एक मेरा घर है, जहाँ सन्नाटा पसरा रहता है।"
सुमित ने नेहा का हाथ पकड़ना चाहा, पर नेहा पीछे हट गई और रसोई की तरफ चली गई। सुमित पीछे-पीछे गया।
"नेहा, माँ की बातों का बुरा मत माना करो। वो पुरानी सोच की हैं।" सुमित ने फुसफुसाते हुए कहा।
"पुरानी सोच की हैं या पत्थर दिल हैं सुमित? उन्हें मेरी सेहत की चिंता नहीं है, उन्हें बस एक वारिस चाहिए। क्या मैं इंसान हूँ या सिर्फ एक ज़रिया?" नेहा की आवाज़ रुंधी हुई थी।
"मैं हूँ न तुम्हारे साथ। सब ठीक हो जाएगा।" सुमित ने उसे ढांढस बंधाया।
महीने बीते। घर का माहौल किसी भारी पत्थर जैसा बोझिल हो गया था। सुमित्रा जी ने नेहा का मंदिर जाना, बाहर घूमना और यहाँ तक कि अपनी पसंद के कपड़े पहनना भी टोका-टाकी के घेरे में ले लिया था। फिर एक सुबह वह हुआ, जिसकी सबको प्रतीक्षा थी।
नेहा ने घबराते हुए सुमित को बाथरूम से बाहर आकर बताया, "सुमित... रिपोर्ट पॉजिटिव है।"
सुमित की आँखों में खुशी चमक उठी। उसने नेहा को गले लगा लिया। "देखा? मैंने कहा था न!"
जैसे ही यह खबर सुमित्रा जी तक पहुँची, उन्होंने पूरे घर को फूलों से सजवा दिया। पर इस खुशी के पीछे एक गहरी साजिश दबी हुई थी।
दोपहर के खाने पर सुमित्रा जी ने नेहा की थाली में ज्यादा घी डालते हुए कहा, "अब तुम्हें अपना बहुत ख्याल रखना होगा नेहा। अब तुम अकेली नहीं हो, हमारे कुल की अमानत तुम्हारे अंदर है।"
नेहा ने मुस्कुराकर कहा, "जी माँ जी। मुझे भी बहुत खुशी है।"
"खुशी तो तब पूरी होगी जब वो 'अमानत' सही सलामत आएगी। सुमित, तुमने उस डॉक्टर से बात की?" सुमित्रा जी का स्वर अचानक गंभीर हो गया।
सुमित ने खाना रोक दिया। "माँ, अभी तो सिर्फ दो महीने हुए हैं।"
"वक्त बीतते देर नहीं लगती। मैं कल तुम्हें एक पुराने जानकार डॉक्टर के पास ले जाऊंगी नेहा। वो बहुत अनुभवी हैं।"
नेहा को कुछ अजीब लगा। "पर माँ जी, मेरी रेगुलर डॉक्टर तो डॉक्टर खन्ना हैं।"
"अरे, वो नई उम्र की लड़कियां क्या जानेंगी? कल हम शहर से बाहर वाले क्लीनिक चलेंगे। बस एक छोटा सा टेस्ट है।" सुमित्रा जी की आँखों में वह चमक दोबारा लौटी, जो नेहा को डराती थी।
अगले दिन, शहर के बाहरी इलाके के एक छोटे से सफेद क्लिनिक में नेहा को ले जाया गया। वहाँ की गंध उसे बेचैन कर रही थी। सुमित बाहर हॉल में बैठा था, उसका सिर झुका हुआ था। सुमित्रा जी डॉक्टर के केबिन में थीं।
जब नेहा बाहर आई, वह बहुत कमज़ोर महसूस कर रही थी। उसे एक कमरे में लिटा दिया गया। कुछ देर बाद सुमित अंदर आया।
"सुमित... क्या टेस्ट था वो? उन्होंने मुझे बेहोश क्यों किया?" नेहा ने धुंधली आँखों से पूछा।
सुमित ने जवाब नहीं दिया। वह खिड़की के बाहर सूखी घास को देख रहा था।
"सुमित! मैं कुछ पूछ रही हूँ। क्या सब ठीक है? मेरा बच्चा ठीक है न?" नेहा चिल्लाई।
सुमित उसकी तरफ मुड़ा। उसके चेहरे पर पसीना था। "बच्चा ठीक है नेहा। पर... माँ जो चाह रही थी, वो नहीं है।"
नेहा का दिल डूबने लगा। "क्या मतलब?"
"वो... लड़की है, नेहा।" सुमित की आवाज़ किसी ठंडी राख जैसी थी।
नेहा ने अपने पेट पर हाथ रखा। "लड़की है? तो? ये तो अच्छी बात है न सुमित? हम तो हमेशा से कहते थे कि हमें एक नन्ही परी चाहिए।"
तभी सुमित्रा जी केबिन में दाखिल हुईं। उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी, बस एक क्रूर निश्चय था। "परी नहीं चाहिए नेहा। परी दूसरों के घर अच्छी लगती है। हमारे यहाँ तो रक्षक चाहिए। वारिस चाहिए।"
नेहा बिस्तर से उठने की कोशिश करने लगी। "आप क्या कह रही हैं माँ जी? वो जान है, मेरी जान है।"
"अभी वो सिर्फ एक संभावना है नेहा। अभी समय है। डॉक्टर से बात हो गई है। आधा घंटा लगेगा, फिर सब साफ हो जाएगा। अगले साल हम फिर कोशिश करेंगे, किसी अच्छे मुहूर्त में।" सुमित्रा जी ने जैसे कोई व्यापारिक सौदा सुनाया हो।
नेहा की रूह कांप गई। उसने सुमित की तरफ देखा। "सुमित! तुम कुछ कह क्यों नहीं रहे? तुम्हारी माँ क्या कह रही हैं, क्या तुम्हें सुनाई दे रहा है?"
सुमित ने हकलाते हुए कहा, "नेहा... माँ कह रही हैं कि समाज में... जायदाद में... बेटा जरूरी होता है। एक बार उनकी बात मान लो, फिर जो तुम कहोगी वही होगा।"
नेहा को लगा जैसे उसके चारों तरफ की दीवारें उसे कुचलने आ रही हैं। वह हँसी, एक ऐसी हँसी जिसमें दर्द और नफरत का मेल था।
"समाज? जायदाद? सुमित, तुम उस नन्ही सी धड़कन को जायदाद के लिए मारने की बात कर रहे हो? वो तुम्हारी बेटी है!"
"मेरी बात समझो नेहा, माँ का दिल टूट जाएगा।" सुमित ने दलील दी।
"और मेरा? मेरा क्या सुमित? मैं जो इस नन्हीं जान को महसूस कर रही हूँ, मेरा दिल क्या पत्थर का है? और माँ जी, आप तो खुद एक औरत हैं। क्या आपकी माँ ने भी आपके जन्म से पहले यही सोचा था?"
सुमित्रा जी ने मेज पर हाथ पटका। "मुझसे जुबान मत लड़ाओ! मैंने इस घर के लिए अपनी पूरी जवानी गला दी है। मुझे हक है ये फैसला लेने का।"
"आपको हक है जान लेने का?" नेहा अब खड़ी हो चुकी थी, हालांकि उसके पैर लड़खड़ा रहे थे। उसने अपने हाथ से ड्रिप की सुई खींचकर निकाल दी। खून की एक बूंद फर्श पर गिरी।
"ये तुम क्या कर रही हो?" सुमित घबराकर आगे बढ़ा।
"मुझसे दूर रहो सुमित!" नेहा की आवाज़ में बिजली सी कड़क थी। "आज तुमने साबित कर दिया कि तुम एक रीढ़विहीन इंसान हो। तुमने अपनी माँ की ज़हरीली सोच के आगे अपनी औलाद का सौदा कर दिया।"
"नेहा, पागल मत बनो। बाहर बारिश हो रही है, कहाँ जाओगी?" सुमित्रा जी ने उपहास किया।
"जहाँ इंसानियत हो माँ जी। जहाँ बेटियों को पैदा होने से पहले कफन न पहनाया जाता हो।" नेहा ने अपना पर्स उठाया और लड़खड़ाते कदमों से बाहर की ओर बढ़ी।
"अगर इस दरवाजे से बाहर गई, तो इस घर के दरवाजे तुम्हारे लिए हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे!" सुमित्रा जी पीछे से चिल्लाईं।
नेहा रुकी। उसने पीछे मुड़कर देखा। उसकी आँखों में अब आंसू नहीं थे, बस एक धधकती आग थी। "ये घर? ये घर तो कब का मर चुका है माँ जी। यहाँ सिर्फ दीवारें हैं, इंसान नहीं। आप अपनी जायदाद और अपने खोखले वारिस की चाहत के साथ इसी कब्रिस्तान में रहिए।"
सुमित ने उसे रोकना चाहा। "नेहा, कम से कम बात तो सुनो..."
"बातें खत्म हो गई हैं सुमित। आज तुमने मेरा पति होने का हक खो दिया है। जो बाप अपनी बेटी की ढाल नहीं बन सकता, वो उसे छूने का हक भी नहीं रखता।"
नेहा अस्पताल के गलियारे से बाहर निकल आई। तेज़ बारिश उसके चेहरे पर पड़ रही थी, पर उसे ठंड नहीं लग रही थी। उसके अंदर का गुस्सा उसे गर्म रखे हुए था। उसने एक ऑटो रोका।
"कहाँ जाना है बेटी?" ऑटो वाले ने पूछा।
नेहा ने अपने पेट पर हाथ रखा, जहाँ उसकी बेटी सुरक्षित थी। "वहाँ... जहाँ से एक नई ज़िंदगी शुरू होती हो।"
पीछे क्लिनिक के केबिन में सुमित्रा जी अभी भी खड़ी थीं, उनका चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था। सुमित सोफे पर बैठ गया और अपना चेहरा हाथों में छिपा लिया।
बारिश की बूंदें गिरती रहीं, पर उस घर की गंदगी धोने के लिए वे काफी नहीं थीं। नेहा जा चुकी थी, अपने साथ उस घर की असली रौनक और आने वाली पीढ़ी की उम्मीद लेकर। समाज के लिए वह शायद 'भटकी हुई' थी, पर खुद के लिए और अपनी अजन्मी बेटी के लिए, वह एक विजेता थी जिसने कोख के इस कुरुक्षेत्र में हार मानने से इनकार कर दिया था।