गाँव की पगडंडी पर धूल उड़ रही थी। सूरज ढलने को था, लेकिन हवा में एक अजीब सी तपन थी। माधव अपनी पुरानी साइकिल रोके खड़ा था। सामने खलिहान में पंचायत बैठी थी। सन्नाटा ऐसा कि सूखे पत्तों के गिरने की आवाज़ भी साफ़ सुनाई दे।
"माधव, तू पागल हो गया है क्या?" मुखिया जी की कड़क आवाज़ ने ख़ामोशी तोड़ी।
माधव ने अपनी साइकिल का स्टैंड लगाया और धीरे से आगे बढ़ा, "मुखिया जी, पागलपन की बात नहीं है। बस ये पूछ रहा हूँ कि इस बेज़ुबान का कसूर क्या है?"
मुखिया जी ने अपने अंगोछे से माथा पोंछा और पास बैठे पंडित जी की तरफ देखा। पंडित जी ने अपनी आँखों पर चढ़ा चश्मा ठीक किया और बोले, "माधव बेटा, ये शास्त्र की बात है। पिछले तीन साल से बारिश नहीं हुई है। धरती फट रही है। अगर कल सुबह इस बकरे की बली नहीं चढ़ी, तो इस साल भी अकाल पड़ेगा।"
"पंडित जी, क्या बारिश का कनेक्शन खून से है?" माधव ने शांत लेकिन दृढ़ लहजे में पूछा।
"तमीज़ से बात कर माधव!" पास खड़े सुखिया ने चिल्लाकर कहा, "पूरा गाँव प्यासा मर रहा है और तुझे दया सूझ रही है? ये बकरा गाँव की खुशहाली के लिए जा रहा है।"
माधव मुस्कराया, पर उस मुस्कराहट में दर्द था। उसने पास ही खूँटे से बँधे उस सफेद बकरे की गर्दन पर हाथ फेरा। बकरा अपनी मासूम आँखों से माधव को देख रहा था।
"सुखिया भाई, खुशहाली खून बहाने से आती तो कसाई का घर सबसे अमीर होता," माधव ने कहा।
"तू शहर में पढ़ क्या लिया, धर्म-कर्म भूल गया?" मुखिया जी ने मेज़ थपथपाई, "कल सुबह सूर्योदय से पहले बली चढ़ेगी। ये पंचायत का फैसला है। और माधव, तू इसमें दखल नहीं देगा।"
माधव चुप रहा। उसने देखा कि गाँव के लोग उसे नफ़रत भरी नज़रों से देख रहे थे। वह अपनी साइकिल लेकर धीरे-धीरे अपने घर की ओर चल दिया। घर पहुँचते ही उसकी पत्नी, राधा, दरवाज़े पर ही खड़ी मिली।
"सुना मैंने, तुम पंचायत में भिड़ गए?" राधा के स्वर में चिंता थी।
"भिड़ा नहीं राधा, बस एक सवाल पूछा था," माधव ने आंगन में बैठकर लोटा उठाया।
"सवाल पूछने का ये समय नहीं है माधव। लोग डरे हुए हैं। उन्हें लगता है कि अगर बली नहीं दी गई, तो कुदरत का कहर टूटेगा। तुम क्यों विलेन बन रहे हो?" राधा ने उसके पास बैठते हुए कहा।
"विलेन मैं हूँ या वो सोच जो कहती है कि किसी की जान लेकर पानी मिलेगा?" माधव ने पानी पीते हुए राधा की आँखों में देखा।
"पर तुम अकेले क्या कर लोगे? कल सुबह पूरा गाँव वहाँ होगा," राधा ने धीरे से कहा।
"देखते हैं राधा। रात अभी बाकी है," माधव ने छत की ओर देखते हुए कहा, जहाँ आसमान बिल्कुल साफ था, बारिश का एक कतरा भी नज़र नहीं आ रहा था।
रात के करीब दो बज रहे थे। गाँव में कुत्तों के भौंकने की आवाज़ें आ रही थीं। माधव की आँखों में नींद नहीं थी। वह चुपके से उठा और टॉर्च लेकर मंदिर की ओर चल दिया, जहाँ उस बकरे को रखा गया था।
मंदिर के बाहर सुखिया और दो अन्य लोग पहरा दे रहे थे।
"कौन है?" सुखिया ने चिल्लाकर टॉर्च जलाई।
"मैं हूँ सुखिया भाई, माधव," माधव धीरे से पास आया।
"यहाँ क्या कर रहा है इस वक्त? जा घर जा," सुखिया ने संदिग्ध नज़रों से देखा।
"नींद नहीं आ रही थी। सोचा एक बार फिर बात करूँ। देखो सुखिया भाई, तुम भी जानते हो कि पिछले साल भी हमने दो बकरों की बली दी थी, पर क्या हुआ? फसल तो फिर भी नहीं हुई," माधव ने बात छेड़ी।
"वो... वो शायद विधि में कमी रह गई होगी। इस बार पंडित जी ने खुद विधि तैयार की है," सुखिया का स्वर थोड़ा लड़खड़ाया।
"विधि में कमी थी या हमारे कर्मों में? हमने कुआँ खोदना बंद कर दिया, नहर की सफाई नहीं की, बस खून बहाने पर भरोसा कर लिया," माधव ने एक और प्रहार किया।
"तू हमें ज्ञान मत दे माधव। मुखिया जी को पता चला तो वो तुझे गाँव से बाहर कर देंगे," सुखिया ने बीड़ी सुलगाते हुए कहा।
माधव ने महसूस किया कि सुखिया के मन में थोड़ा संशय है। उसने धीरे से कहा, "अच्छा, एक बात बताओ। अगर कल बली चढ़ गई और फिर भी बारिश नहीं हुई, तो? क्या तुम पंडित जी से सवाल पूछोगे?"
सुखिया चुप हो गया। उसने आसमान की तरफ देखा।
तभी मंदिर के अंदर से बकरे की 'में-में' की आवाज़ आई। माधव का दिल बैठ गया। वह बिना कुछ बोले वहाँ से हट गया, लेकिन वह घर नहीं गया। वह सीधा गाँव के दूसरे छोर पर स्थित उस पुराने कुएँ पर पहुँचा जो सालों से सूखा पड़ा था।
सुबह के चार बज रहे थे। आकाश में हल्की लाली छाने लगी थी। गाँव के लोग धीरे-धीरे मंदिर के सामने इकट्ठा होने लगे। ढोल की आवाज़ गूँजने लगी थी। बकरे को लाल कपड़ा पहनाया गया था और उसके माथे पर सिंदूर लगा था।
मुखिया जी आए और पंडित जी ने मंत्र पढ़ना शुरू किया।
"जल्दी करो पंडित जी, शुभ मुहूर्त निकल रहा है," मुखिया जी ने कहा।
पंडित जी ने हाथ में बड़ा सा खंजर लिया। बकरा सहमा हुआ था। जैसे ही पंडित जी ने हाथ उठाया, भीड़ में से एक आवाज़ आई।
"रुकिए!"
सबने मुड़कर देखा। माधव खड़ा था, पर वह अकेला नहीं था। उसके पीछे गाँव के कुछ नौजवान लड़के थे, जिनके हाथों में कुदाल और फावड़े थे।
"फिर आ गया तू?" मुखिया जी चिढ़ गए।
"मुखिया जी, बली चढ़ानी है तो चढ़ाइए, पर पहले मेरी एक बात सुन लीजिए," माधव ने पास आकर कहा।
"अब क्या है?" पंडित जी ने गुस्से में पूछा।
"मैंने कल रात उस सूखे कुएँ में जाकर देखा। वहाँ कचरा इतना भर गया है कि नीचे का सोता (water source) बंद हो गया है। अगर हम आज ये खून बहाने के बजाय, अगले तीन घंटे उस कुएँ की सफाई में लगा दें, तो शायद पानी निकल आए," माधव ने हाथ जोड़कर कहा।
"बकवास बंद कर! पानी भगवान की मर्जी से आता है," मुखिया जी चिल्लाए।
"भगवान ने हमें हाथ मेहनत करने के लिए दिए हैं, मुखिया जी, न कि किसी बेगुनाह को मारने के लिए। अगर आज कुआँ साफ करने के बाद भी पानी नहीं निकला, तो मैं खुद इस बकरे को पकड़ूँगा। बोलिए, मंजूर है?" माधव की आवाज़ में एक चुनौती थी।
भीड़ में फुसफुसाहट शुरू हो गई। कुछ नौजवानों को माधव की बात सही लगी।
"मुखिया जी, माधव सही कह रहा है। पिछले साल भी तो कुछ नहीं हुआ था," एक लड़के ने कहा।
पंचायत में बहस शुरू हो गई। समय बीत रहा था। आखिरकार, मुखिया जी को झुकना पड़ा क्योंकि गाँव के युवा माधव के साथ हो गए थे।
"ठीक है! तीन घंटे। अगर तीन घंटे में पानी की एक बूंद नहीं दिखी, तो माधव, तू इस बकरे के साथ-साथ गाँव की सजा भी भुगतेगा," मुखिया जी ने शर्त रखी।
पूरा गाँव कुएँ की ओर दौड़ पड़ा। माधव, सुखिया और बाकी लड़के कुएँ में उतर गए। मलबा निकाला जाने लगा। पसीने से सब लथपथ थे। एक घंटा बीता, दो घंटे बीते। धूप तेज होने लगी थी।
मुखिया जी घड़ी देख रहे थे, "सिर्फ पन्द्रह मिनट बचे हैं!"
कुएँ के अंदर माधव पागलों की तरह खुदाई कर रहा था। उसके हाथ से खून निकल रहा था।
"माधव, रहने दे। कुछ नहीं होने वाला," सुखिया थककर बैठ गया।
"नहीं सुखिया भाई, थोड़ा और..." माधव ने एक बड़ा पत्थर हटाया।
अचानक, नीचे से एक अजीब सी आवाज़ आई। जैसे कुछ फूट रहा हो।
"ऊपर भागो! सब ऊपर भागो!" माधव चिल्लाया।
जैसे ही सब बाहर निकले, कुएँ के अंदर से ठंडे पानी का एक फव्वारा ऊपर की ओर फूटा। सड़ांध भरा मलबा साफ हो गया और नीचे से स्वच्छ जल की धारा निकलने लगी।
पूरा गाँव दंग रह गया। सन्नाटा छा गया।
माधव कुएँ की मुंडेर पर बैठकर हाँफ रहा था। तभी, आसमान में अचानक काली घटाएं छाने लगीं। ठंडी हवा चलने लगी। और देखते ही देखते, झमाझम बारिश होने लगी।
गाँव वाले पागलों की तरह नाचने लगे। पंडित जी के हाथ से खंजर गिर गया। मुखिया जी खामोश खड़े थे।
माधव धीरे से मंदिर की ओर गया। वह बकरा अभी भी वहाँ बँधा हुआ था। माधव ने उसकी रस्सी खोल दी। बकरा आज़ाद होते ही सीधा कुएँ की ओर भागा और पानी पीने लगा।
"माधव..." मुखिया जी पीछे से आए और उसके कंधे पर हाथ रखा, "हमें माफ़ कर दे। हम खून में समाधान ढूंढ रहे थे, जबकि समाधान पसीने में था।"
माधव ने आसमान की ओर देखा, जहाँ से गिरती बूंदें उसके ज़ख्मों को धो रही थीं।
"मुखिया जी, अंधविश्वास डराता है, और मेहनत रास्ता दिखाती है। आज इस बेज़ुबान की जान नहीं बची, बल्कि हमारे गाँव का ज़मीर बच गया," माधव ने शांत भाव से कहा।
तभी राधा दौड़ती हुई आई और माधव के हाथ पर पट्टी बांधने लगी।
"कहा था न मैंने, रात अभी बाकी है," माधव मुस्कराया।
गाँव में आज उत्सव था, पर किसी बली का नहीं, बल्कि इंसानियत की जीत का। ढोल अब भी बज रहे थे, लेकिन इस बार उनकी आवाज़ में दहशत नहीं, एक नई शुरुआत की धमक थी। वह बकरा अब गाँव का पालतू बन चुका था, जिसे लोग 'किस्मत' कहने लगे थे, पर माधव जानता था कि असली किस्मत उसकी मेहनत और सच के साथ खड़े होने की हिम्मत थी।