Trisha - 27 in Hindi Women Focused by vrinda books and stories PDF | त्रिशा... - 27

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त्रिशा... - 27

कल्पना और कल्पेश सिंह भदौरिया कि एकलौती बेटी त्रिशा की शादी आज बड़े ही धूमधाम और गाजे बाजे के साथ सम्पन्न हुई। दोनों ने कोई कसर ना छोड़ी थी अपनी बेटी की शादी में। बेशक बिना लेन देन की शादी थी लेकिन फिर भी ऐसा कुछ ना था जो त्रिशा के घरवाले देना भूल गए हो। बड़े से बड़ा और छोटा से छोटा हर एक सामान उन्होनें अपनी बेटी के लिए दिया था। कानपुर से सारे सामान को पूना तक ले जाना बहुत मुश्किल पड़ता और ऊपर से खर्चा भी ज्यादा होता इसलिए त्रिशा के भाई और पापा खुद पहले पूना जाकर सारा सामान वहां से खरीद कर त्रिशा और राजन के फ्लैट पर रखवा कर आए थे‌। 

एल० ई० डी टीवी, डबल डोर फ्रिज, डबल बैड, एसी, ड्रेसिंग टेबल, वाशिंग मशीन, कार, सोफा, ओवन, कूलर, बुक शेल्फ(क्योंकि त्रिशा को पढ़ने का बहुत शौक है।), वाटर फिल्टर, मिक्सर, जूसर,  किचन का सामान इत्यादि  सभी सामान और साथ ही में राजन के लिए दो सोने की अंगूठियां, एक सोने की चैन, राजन की मां और दादी मां के लिए भी एक एक अंगूठी। और साथ में सभी दूर‌ दूर तक के रिश्तेदारों के कपड़े और 500रुपय मान में दिए गए। 

अपनी हैसियत से बढ़कर सामान दिया, शहर का बेस्ट हलवाई, शहर का बेस्ट मैरिज होम, शहर का बेस्ट बैंड सब एकदम बेस्ट था और इन्हीं सब के बीच सारी रिती रिवाजों के साथ विवाह पूरा होने पर जब विदाई का समय आया तो सारा भदौरिया परिवार भावुक हो उठा।  हालंकि कल्पना और कल्पेश की आंखे तो कन्यादान के बाद से ही नम हो चुकी थी। सोच सोच के कलेजा छलनी हुआ जा रहा था दोनों का कि अपने जिगर का टुकड़ा कैसे किसी और को सौंप दें। कल्पना तो रह रह कर रस्मों के बीच में रोने लग जाती थी। सभी लोग उसे बार बार धीरज बंधाते और वह कुछ समय को शांत भी हो जाती लेकिन त्रिशा के चले जाने का ख्याल उसे बार बार रुला जाता। 

विदाई के समय पर त्रिशा के मां और मामी अपने आंसू पोंछ पोंछ कर उसे गले लगा कर बार बार तरह तरह की नसीहत और सीख त्रिशा को दे रहे थे। उसे सब कुछ समझने की कोशिश कर रहे थे कि किस किस बात का ख्याल ससुराल में रखना है क्या क्या करना है और क्या क्या नहीं करना है सब समझाया जा रहा था। त्रिशा खुद भी अपने आंसुओं को रोक कर उनकी बात ध्यान से सुन रही थी ताकि उस से वहां कोई चूक ना हो जाए। 

त्रिशा खुद यहां से सबको, अपने माता पिता, मामी मामा, भाईयों, भाभी और सहेली को छोड़कर जाने से दुखी और एक नई जगह पर सदा सदा कर जाकर बसने के ख्याल से डरी हुई थी, वह भले अपनी मां और मामी की बात पर सिर हिला रही हो पर असल बात तो यह है कि अपनी उलझन और डर के कारण उसने कुछ सुना समझा है ही नहीं। 

अरे वह तो खुद, खुद में ही उलझी हुई है," मैं इन सबको छोड़कर कैसे जाऊंगी?????? कैसे रह सकूंगी मैं इन सबसे दूर???? अपने घर से मम्मी पापा से, मामा मामी से....
कैसे????? कैसे होगा मुझसे यह सब?????" त्रिशा के अंतर्मन में उठ रही आवाज ने कहा। 

रिश्ता पक्का होने से लेकर अब तक वो हर रोज इस विदाई की घड़ी के लिए खुद को तैयार कर रही थी। उसने हर रोज खुद से हजार बार बोल बोल कर खुद को यह आदत डलवाई थी कि उसे यहां से जाना है। उसका समय इस घर में पूरा हो चुका है और अब वह चाहकर भी यहां नहीं रह सकती तो अब उसे यहां से जाना ही है। पर अब जब सच में वह घड़ी आई है तो उसका साहस उसका साथ छोड़ता सा जान पड़ रहा है। 

"मां मुझे नहीं जाना!!!!!! पापा मैं नहीं जाना चाहती!!!!! मामा मुझे रोक लो ना!!!!! मामी तुम ही कुछ कर लो ना!!!!! " त्रिशा जोर जोर से चीखकर यह सब कहना चाहती थी अपने घरवालों से पर वह जानती थी कि इन सबका कोई फायदा नहीं होगा। उसे जाना ही होगा यहां से। वो जानती है कि उसे यहां से भेजना उसके घरवालों के लिए भी आसान नहीं है और अगर वो अपने मन के एक भी सच्चे भाव की इस समय कह देगी तो उसका उन सभी को ओर उन सभी का उसको विदा करना बहुत मुश्किल हो जाएगा। इसलिए वह अपने दिल और दिमाग को इसके लिए तैयार करने लगी। 

विदाई का अंतिम समय आते ही त्रिशा की आंखें आसूंओं से भर गई, उसकी। सारी हिम्मत टूट गई। अब वो अपने आप को जितना मर्जी समझा ले पर अब उसके आसूं रुकने वाले कहां थे और उसके आसूंओं को देखकर उसके माता पिता, मामा मामी, चारों भाई, उसकी भाभी और उसकी सहेली महक सभी भावनाओं में बह गए। उन सभी के  वो आसूं जो अब तक अंदर ही अंदर कहीं छिपे थे अब रुक ना सके और नदी पर बांध टूट जाने के बाद आए जल बहाव की तरह बह निकले। 

कल्पेश जो हमेशा अपनी कड़क आवाज के लिए विख्यात थे आज अपनी बेटी की विदाई पर एकदम धीरज खो चुके थे। इस से पहले कल्पेश केवल अपने माता पिता की मृत्यु पर ही इस तरह रोए थे। वो त्रिशा के पास आए और उन्होंने अपने कलेजे के टुकड़े को सीने से लगा लिया। और जैसे ही त्रिशा अपने पिता से लिपटी फिर तो बस वो अपने पिता से लिपटकर खूब बिलख बिलख कर रोई। पिता पुत्री के आंखों से इस समय आंसुओं की ऐसी बाढ़ निकली कि बाकी सभी परिजन भी खुद को रोक ना पाए। 

कैसी अजीब विडंबना है यह जिस बच्ची को बचपन से खुद से चिपका के पाल पोस कर इतने लाड़ प्यार से बड़ा किया, उसे चलाना, बोलना, लिखना, पढ़ना, हंसना सब सिखाया उसे खुद से यूं अलग करना पड़ता है‌। और अलग भी ऐसे की आज के बाद वो उनसे ज्यादा किसी ओर की अपनी हो जाएगी और वे सभी आज के बाद उसके लिए थोड़े और दूर और हो जाएंगे। मां बाप की लाडली बचपन से जिस घर में खेल कर बड़ी हुई आज के बाद उस घर में केवल एक मेहमान भर बनकर आया करेगी और ना जाने कितने दिन रुक पाया करेगी और आ भी पाया करेगी या सालों इंतजार करवाया करेगी। पर क्या करे सदियों से बने यह रिवाज ही ऐसा है कि क्या किया जा सकता है। युगों युगों से बलिदान का ठेका तो समाज ने नारी के ही माथे जो मढ़ा है। ओर यहां तो त्याग सिर्फ बेटी का नहीं है बल्कि उसके माता पिता का भी है।