काल, अंधकार और शून्य : मनुष्य का दोष कहाँ है
उपनिषद वेद–काल की बात नहीं करते।
वे किसी युग, किसी घटना, किसी परिवर्तन की घोषणा नहीं हैं।
वे तो शाश्वत सत्य की ओर संकेत हैं —
उस सत्य की, जो काल से पहले भी था और काल के बाद भी रहेगा।
गीता अलग है।
गीता काल–परिवर्तन की घोषणा है।
गीता उस संधि–क्षण की वाणी है
जहाँ एक युग समाप्त होता है
और दूसरा आरम्भ होता है।
और हर युग–परिवर्तन में
सिर्फ राजनीतिक या सामाजिक संरचनाएँ नहीं बदलतीं,
ज्ञान की प्रकृति भी बदलती है।
कृष्ण केवल धर्मोपदेशक नहीं हैं।
वे काल–चेतना का अवतार हैं।
परम पुरुष का वह रूप
जो यह जानता है कि
यदि उस समय का विज्ञान जीवित रहता,
यदि वह शक्ति आगे बढ़ती,
तो मनुष्य उसका उपयोग नहीं —
दुरुपयोग करता।
तब दोष मनुष्य का नहीं होता,
दोष काल का होता।
इसीलिए काल–संध्या में
वह युद्ध घटित हुआ
जिसमें केवल शस्त्र नहीं नष्ट हुए,
विज्ञान की पूरी धारा सोने भेज दी गई।
कृष्ण ने उसे नष्ट नहीं किया —
उसे सुला दिया।
और इसीलिए उस विज्ञान को
“पुण्य” कहा गया।
क्योंकि वह नाश नहीं था,
संरक्षण था।
आज कृष्ण सोए हुए हैं।
काल फिर रात्रि में है।
मनुष्य फिर गहरे अंधकार की ओर बढ़ रहा है।
जब यह अंधकार अपनी सीमा छुएगा,
तब काल फिर करवट लेगा।
कृष्ण फिर जाग्रत होंगे —
और सत्य–असत्य फिर स्पष्ट होगा।
इसलिए आज जो कुछ घट रहा है —
राजनीति, धर्म, विज्ञान, सत्ता —
वह सब रात्रि का प्रभाव है।
मनुष्य भयभीत है।
असुरक्षा में है।
और इसलिए वह
धर्म को आश्वासन बनाकर जी रहा है,
विज्ञान को सहारा बनाकर जी रहा है।
जबकि सत्य यह है कि
यदि ब्रह्मांड एक से उत्पन्न हुआ है,
तो अच्छा–बुरा, प्रकाश–अंधकार
कोई दूसरा नहीं हो सकता।
दूसरा होना असंभव है।
अंधकार भी उसी का खेल है।
प्रकाश भी उसी का खेल है।
इसीलिए शास्त्र कहते हैं —
ज्ञान भी शून्य है,
ईश्वर भी शून्य है।
यदि ईश्वर प्रकाश होता,
तो अंधकार किसका होता?
यदि ईश्वर शुभ होता,
तो अशुभ किसका होता?
इसलिए गहरे अर्थ में
न पाप है, न पुण्य।
न श्रेष्ठ है, न अनिष्ट।
शून्य ही परम सत्य है।
और फिर भी —
अस्तित्व ने शास्त्र रचे,
विज्ञान रचा,
मार्ग रचे।
यह सब सत्य के विरुद्ध नहीं है।
यह सत्य की ही लीला है।
तब मनुष्य दोषी कहाँ है?
मनुष्य का दोष
अत्यंत सूक्ष्म है।
दोष यह नहीं कि वह क्या कर रहा है।
दोष यह भी नहीं कि वह अंधकार में है।
दोष सिर्फ इतना है कि —
“मैं कौन हूँ” — यह उसने नहीं देखा।
‘मैं हूँ’ —
यही वह बीज है
जिससे अंधकार का विस्तार होता है।
अस्तित्व स्वयं भी
अपने को जानना चाहता था।
यही उसकी इच्छा थी।
यही उसकी “भूल” थी।
उस एक सूक्ष्म स्पंदन से
पूरा ब्रह्मांड फैल गया।
वैसी ही एक भूल
मनुष्य के भीतर भी है।
पहली भूल से ब्रह्मांड रचा।
दूसरी भूल से
धर्म, विज्ञान, सत्ता, धन, विजय रचे।
मनुष्य अपनी ही माया में
सत्य खोज रहा है —
जबकि सत्य तो यही है
कि ‘मैं’ को उसने समझा नहीं।
इसीलिए
तप, त्याग, भक्ति, साधना
जब ‘मैं’ को समझे बिना होती है,
तो वह भी अंधकार बढ़ाती है।
खोजना अहंकार है।
जीना शाश्वत है।
सत्य खोजने से नहीं मिलता।
सत्य जीने से खुलता है।
और जब मनुष्य सचमुच जीता है —
तो चाहे कितना ही घनघोर अंधकार हो,
एक क्षण में
प्रकाश दिखाई देता है।
इसीलिए वेदांत2.0
अच्छा–बुरा नहीं बाँटता।
पाप–पुण्य नहीं गिनता।
मार्गों की प्रतिस्पर्धा नहीं करता।
वह बस इतना कहता है —
होश में जियो।
यही परम सत्य है।