0 से मानव तक — और मानव से 0 तक
░A░ ░P░h░i░l░o░s░o░p░h░y░ ░t░h░a░t░ ░T░r░a░n░s░f░o░r░m░s░ ░S░p░i░r░i░t░u░a░l░i░t░y░ ░i░n░t░o░ ░a░ ░S░i░m░p░l░e░ ░S░c░i░e░n░c░e░
० से मानव तक आने की यात्रा में
और मानव से फिर ० की ओर लौटने की प्रक्रिया में
एक अनुभव करोड़ों बार घटित होता है —
जिसे संसार दुःख कहता है।
पर यह दुःख कोई त्रुटि नहीं है।
यह कोई दंड या अभिशाप नहीं है।
यह स्वाभाविक प्रक्रिया है।
इससे कोई नहीं बच सकता —
यदि कहा जाए कि भगवान भी नहीं बच सकता,
तो भी सत्य अधूरा नहीं होता।
क्योंकि वास्तविकता यह है कि
कोई अलग से भगवान नहीं है।
हर जीव स्वयं भगवान है।
कोई विशेष सत्ता बनकर पैदा नहीं हुआ —
सब एक ही प्रक्रिया से गुज़रे हैं।
जो इस प्रक्रिया को समझ लेता है,
वही भगवान कहलाता है।
जो भीड़ से,
मान्यताओं से,
और क्षणिक सुखों से ऊपर उठ जाता है —
वह भगवान बन जाता है।
जो अपनी वास्तविकता को उपलब्ध हो जाता है —
वही भगवान है।
परिवर्तन = जन्म
जैसे ८४ लाख योनियाँ हैं,
वैसे ही मानव शरीर में आने के बाद
८४ लाख सूक्ष्म परिवर्तन होते हैं।
हर परिवर्तन
एक प्रसव है,
एक नया जन्म है।
और हर जन्म के साथ
क्षणिक पीड़ा जुड़ी होती है —
जिसे मनुष्य दुःख कह देता है।
दुनिया की मूल भूल
इस संसार में
दुःख को समझने का ज्ञान नहीं दिया जाता,
दुःख से बचने का ज्ञान दिया जाता है।
पूरी मानव जाति पूछती है —
“दुःख से कैसे बचें?”
धर्म, दर्शन, विज्ञान, विकास —
सब दुःख से बचने के उपाय सिखाते हैं।
जबकि अस्तित्व की दृष्टि से
दुःख जैसा कुछ है ही नहीं।
सीढ़ियों का सत्य
जीवन एक सीढ़ी की तरह है।
एक सीढ़ी से दूसरी पर रखते समय
क्षण भर का दबाव होता है —
और फिर
लंबा सुख!
पर मनुष्य ने
क्षणिक सुख को अनंत सुख मान लिया
और क्षणिक दुःख को महादुःख।
यहीं से भ्रम पैदा होता है।
जीवन का मूल नियम
परिवर्तन संसार का नियम है।
हर परिवर्तन एक जन्म है।
जो नया उत्पन्न होता है
उसमें क्षणिक पीड़ा होती है।
पर जन्म और मृत्यु के बीच
जो जीवन है —
वह अद्भुत, अलौकिक
और आनंद से भरा है।
इसी कारण कोई मरना नहीं चाहता।
मनुष्य जीवन से प्रेम करता है,
पर जीवन का सत्य नहीं समझ पाता।
ज्ञान की सबसे बड़ी विडंबना
अब तक जितने भी ज्ञान बने हैं,
वे सब परिवर्तन रोकने के ज्ञान हैं।
एक स्थिति में टिके रहने के उपाय।
एक सीढ़ी पर रुक जाने की तकनीक।
जबकि
रुकना अस्तित्व का स्वभाव नहीं है।
विज्ञान भी यही करता है —
जीवन को स्थिर करने की कोशिश।
पर जीवन स्थिर हो ही नहीं सकता।
अंतिम सत्य
मानव जीवन में
जितना दुःख है —
उतना ही पहले भी था
मानव बनने तक।
फर्क सिर्फ इतना है —
अब चेतना है।
यहाँ दुःख क्षणिक है,
और सुख दीर्घकालीन।
जीवन मूलतः दुःख नहीं है।
जीवन परिवर्तन है।
और परिवर्तन ही जन्म है।
जो इसे समझ लेता है —
वह डरता नहीं,
रुकता नहीं,
और वही भगवान कहलाता है।
शास्त्रों की सहमति (भाव के स्तर पर)
उपनिषद / वेदान्त → दुःख अज्ञान से है, परिवर्तन स्वभाव है
बौद्ध दर्शन → दुःख स्थायी नहीं, प्रक्रिया (अनित्य) है
सांख्य → प्रकृति का गुणात्मक परिवर्तन ही अनुभव है
तंत्र → पीड़ा भी ऊर्जा-रूपांतरण है
जैन दर्शन → बंधन परिवर्तन से नहीं, आसक्ति से है
👉 शास्त्र अलग दिखते हैं, पर केन्द्र एक ही है: परिवर्तन को न समझना ही दुःख है।
बोध-पुरुषों की सहमति
लगभग हर जाग्रत पुरुष (बोध को उपलब्ध व्यक्ति) ने कहा है कि:
जीवन समस्या नहीं है
परिवर्तन शत्रु नहीं है
रुकने की चाह ही पीड़ा है
बोध होने पर “भगवान” अलग सत्ता नहीं रहता
अंतिम सत्य
कोई शास्त्र या महापुरुष यह नहीं कहता कि
“जीवन मूलतः दुःख है”
वे बस अलग-अलग ढंग से यही कहते हैं:
दुःख = परिवर्तन से टकराव
बोध = परिवर्तन के साथ बहना
इसलिए यह दृष्टि किसी एक शास्त्र की नहीं,
बल्कि सभी बोधों का साझा निष्कर्ष है।
𝕍𝕖𝕕𝕒𝕟𝕥𝕒 𝟚.𝟘- 𝔸𝕘𝕪𝕒𝕥 𝔸𝕘𝕪𝕒𝕟𝕚