✦ धर्म की दुकान ✦
जो कहते हैं—
“हम ही सत्य हैं,
गुरु ही ब्रह्मा-विष्णु-महेश हैं,
गुरु ही शास्त्र हैं,”
वहीं से दुकान खुल जाती है।
वे कहते हैं—
पुण्य की चाबी हमारे पास है,
आशीर्वाद हमारे पास है,
धन, साधन, प्रसिद्धि—सब हमारे आशीर्वाद से मिलता है।
गरीब से कहते हैं—
“हमारे आशीर्वाद से सफल हो जाओगे।”
और जो सफल हो गया, उससे कहते हैं—
“सब माया है, त्याग दो, सेवा में लगा दो।”
सेवा का अर्थ बदल जाता है।
तुम दान दो—
वे तुम्हें धन्यवाद देंगे,
और बदले में “पुण्य” का वादा।
सेवा-चवन्नी की शेष डकार लेते है
सेवा भी इक्कठा इकट्ठा करते है।
फाइव-स्टार सुरक्षा उनकी,
फाइव-स्टार सुविधा उनकी,
और नाम “सेवा” का।
धन इकट्ठा होता है पुण्य के नाम पर,
और धनवान को प्रमाण-पत्र मिलता है—
“देखो, यह दानवीर है,
बड़ा धर्म-प्रेमी है।”
धनवान को समझा दिया जाता है—
“तुम पाप से काले हो गए थे,
दान से गोरे हो गए।”
यानी—
अपराध भी धो डाले जाते हैं,
पुण्य की रसीद से।
और साधारण मनुष्य?
वह मान लेता है कि
धनवान बुद्धिमान है,
जबकि सच यह है कि
धनवान ने दुनिया को मूर्ख बनाया धनवान बना गरीब से
धनवान को लूट रहा है धर्म पुण्य के नाम।
गरीब से भी,
धनवान से भी।
धर्म-गुरु सबसे चतुर निकलता है।
कहता है—
“सेवा आपने दी,
मैंने उसे किसी नाम पर लगा दी।”
और हिसाब यहीं खत्म।
यह सच है कि
कई संस्थाएँ धन का सही उपयोग करती हैं,
लेकिन प्रश्न यह नहीं है।
प्रश्न यह है—
इकट्ठा कौन करता है?
किस अधिकार से करता है?
और किस सत्य के नाम पर करता है?
जहाँ सत्य अनुभव नहीं,
सिर्फ़ प्रमाण-पत्र बन जाए—
वहीं धर्म दुकान बन जाता है।।
और दुकान में—
सत्य नहीं बिकता,
केवल डर, लालच और पुण्य के सपने बिकते हैं।
।
विश्व में देश में कई संस्था है बिना धर्म के चलती है वे असली धार्मिक है,
उसकी नकारना अधीन क्योंकि वे धार्मिक नहीं बनते है वे जीवक अपना कर्तव्य निभा रहे विवेक का उपयोग करते है वह सत्य है,
धर्म सेवा से ऊपर समझ ज्ञान विवेक है प्रकाश है माया से बंधन से मुक्ति देता है वह धर्म है।
सेवा सामाजिक व्यवस्था है धर्म विश्वविद्यालय है जो सेवा करते उन्हें मुक्त करता है लेकिन सेवा करने वाला गुरु नहीं इंसान है धनवान हैट्रस्ट है या सेवा अपनी सेवा को सामाजिक संस्था बनाओ, धार्मिक कोई संस्था नहीं होती है धर्म के लिए मात्र अधर्म से रक्षा है मुक्ति है स्वतंत्रता है वह धर्म है
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सृष्टि की आरंभिक स्थिति "प्रथम 0" अर्थात विराट शून्य से मानी गई है — यह ब्रह्म का निराकार रूप है।
इस शून्य के भीतर केंद्र उत्पन्न होता है, जो सूक्ष्म "बिंदु" रूप में है। यह बिंदु चेतना का प्रथम स्पंदन है।जब केंद्र (सूक्ष्म) और परिधि (विस्तार) के द्वैत की अनुभूति होती है, तब उसमें
मानसिक गुण विभाजित होते हैं — तम, रज और सत।
इन तीन गुणों का संयोजन ही "त्रिगुणात्मक प्रकृति" की रचना करता है।
इन्हीं से सूक्ष्म बिंदु उत्पन्न होते हैं — सत (शुद्धता), रज (गति), और तम (स्थूलता)।उन बिंदुओं के मिलन से आकाश तत्व प्रकट होता है, और क्रमशः पंचतत्व — आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी — की सृष्टि होती है
।फिर इन्हीं तत्वों में चेतना प्रवेश कर "जीव" उत्पन्न होता है। जीव दो स्वरूपों से बना है —जड़ (भौतिक तत्वों का शरीर)चेतन (अंतःस्फुरित आत्मा या चैतन्य)।
जब जीव इन दोनों के द्वंद्व में "मैं" का बोध करता है, तब कर्म और इच्छाओं का चक्र आरंभ होता है, जिससे 84 लाख योनियों की यात्रा होती है।
मानव अवस्था में पहुंचकर यह "मैं" अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर स्वयं को सृष्टि का निर्माता मानने लगता है — वहीं से विज्ञान, धर्म, और बुद्धिजीविता की उलझनें जन्म लेती हैं।यह दार्शनिक रूप से ब्रह्मांड और मनुष्य की उत्पत्ति का अद्भुत रूपक है — जहाँ ब्रह्म से प्रकृति, प्रकृति से जीव, और जीव से अहं (मैं) का उदय रूपायित हुआ है।
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