जैसा कि योगेश्वर अग्निवंश ने अश्व धामा को बोला हर रोज वो उसको अपने काल की घटी घटना सुनाएंगे,।
जहाँ योगेश्वर अग्निवंश दूसरा प्रश्न करता है और अश्वत्थामा पहली बार उस सत्य को खोलता है,।
जिसे युगों से लोग अधूरा जानते हैं। वो सत्य जिस में लोग द्रोणाचार्य को गलत मानते आए है ।
(अश्वत्थामा की वाणी से )
योगेश्वर अग्निवंश ने मेरी ओर देखा।
उसकी आँखों में संकोच नहीं था,न ही आरोप
केवल सत्य जानने की तीव्र इच्छा थी।
उसने धीरे से पूछा—
“हे अश्वधामा द्रोणपुत्र,
क्या यह सत्य है कि आपके पिता द्रोणाचार्य ने अर्जुन को आशीर्वाद दिया था—
कि तुम्हारे समान कोई दूसरा धनुर्धर नहीं होगा?”
मैं मौन रहा।
धूनी की आग अचानक भभक उठी।
फिर उसने दूसरा प्रश्न रखा —
और वह प्रश्न बाण की तरह सीधा मेरे हृदय में लगा—
“और एकलव्य?
क्या वह अर्जुन से श्रेष्ठ नहीं था?
यदि था, तो उससे उसका अंगूठा क्यों लिया गया?
लोग कहते हैं —
द्रोणाचार्य ने उसके साथ धोखा किया।” उनको ऐसा नहीं करना चाहिए था क्योंकि गुरु के लिए तो सभी शिष्य एक होते है , ना गरीब ना अमीर छोटा बड़ा, फिर ऐसा क्यों किया द्रोणाचार्य ने ।
मैंने आँखें मूँद लीं।
युगों का भार मेरी साँसों में उतर आया।
“योगेश्वर… यह प्रश्न सरल नहीं है”
मैंने कहा—
“यह कथा वैसी नहीं है जैसी लोक सुनाता है।
और न ही वैसी है जैसी राजदरबारों ने लिखवाई।”
मैंने अग्निवंश की ओर देखा।
“यदि तुम सत्य सुनना चाहते हो, तो सुनो
तो उसे न्याय और अन्याय के तराजू में मत तौलना।
क्योंकि यहाँ हर पात्र
अपने–अपने धर्म से बँधा था।” जैसे कि गंगा पुत्र भीष्म तुम्हे थोड़ा बहुत ज्ञात हो तो , कुरुक्षेत्र का जब युद्ध हुआ तब सब अपने अपने धर्म से बंधे थे ,सब ये जानते थे कि दुर्योधन गलत है ।
वो जो कर रहा वो पाप है ओर पूरे हस्तपुर को बर्बाद कर देगा फिर भी गंगा पुत्र भीष्म द्रोण,ओर खुद मै कृपाचार्य ओर भी कई थे जो धर्म के साथ थे लेकिन हमने साथ किसका दिया दुर्योधन का ।
गंगा पुत्र भीष्म चाहते तो ये युद्ध होता ही नहीं लेकिन उनकी धर्म डोर ओर उनकी दी गई प्रतिज्ञा ने उनको रोक रखा था ।
क्योंकि हम धर्म की डोर से बंधे थे ।
अर्जुन को दिया गया आशीर्वाद
हाँ, यह सत्य है।
एक दिन अभ्यास के बाद
मेरे पिता ने अर्जुन के सिर पर हाथ रखा था।
उन्होंने कहा था—
“अर्जुन,
मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ
कि इस धरती पर
तुमसे श्रेष्ठ धनुर्धर कोई नहीं होगा।”
यह सुनकर
सब चौंक गए।
मैं भी।
पर उस आशीर्वाद में
एक शर्त छिपी थी जिसका अंदाजा मुझे भी नहीं था जिसको लोग नहीं समझते।
एकलव्य का उदय — जंगल का वह बालक
एकलव्य निषादराज हिरण्यधनु का पुत्र था।
वह वन में रहता था।
उसके पास राजकुमारों जैसा गुरुकुल नहीं था।
पर उसके पास कुछ और था —
अदम्य तप और एकनिष्ठ श्रद्धा।
उसने मेरे पिता को गुरु माना।
पर मेरे पिता ने उसे शिष्य नहीं बनाया।
क्यों?
यहाँ से लोग द्रोणाचार्य को दोषी ठहराते हैं।
पर सुनो सच्चाई।
द्रोणाचार्य ने एकलव्य को क्यों अस्वीकार किया
मेरे पिता केवल गुरु नहीं थे।
वे राजधर्म से बँधे आचार्य थे एकलव्य राजवंश से नहीं था ऐसा बोल कर उसे जाने को बोल दिया ।
लेकिन जाते जाते उसने एक ऐसी बात बोली जो आज भी मेरे कानो में गूंजती है ।
आचार्य आपका पुत्र भी वैसे किसी भी राजवंश से नहीं है फिर उसको योद्धा बनने की शिक्षा क्यों दे रहो वो तो ब्राह्मण का पुत्र है ।
इतना बोल कर वो चला गया ।
लेकिन विधि ने
हस्तिनापुर में उन्हें
केवल शिक्षा के लिए नहीं बुलाया था,
बल्कि एक उद्देश्य के लिए बुलाया था—
अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ बनाना।
क्योंकि भविष्य में
कुरुक्षेत्र का युद्ध निश्चित था।
और उस युद्ध में
धर्म को एक ऐसा धनुर्धर चाहिए था
जो कभी लक्ष्य न चूके।
एकलव्य…
यदि वह शिष्य बनता,
तो अर्जुन की एकाग्रता टूट जाती।
मेरे पिता यह जानते थे।
एकलव्य — बिना गुरु के भी शिष्य
पर एकलव्य रुका नहीं।
उसने मेरे पिता की प्रतिमा बनाई।
और उसे गुरु मानकर
दिन–रात अभ्यास किया।
यह बात जब हमें पता चली,
तो मैं स्वयं चकित रह गया।
मैंने उसे देखा था।
योगेश्वर,
मैं सच कह रहा हूँ—
एकलव्य का धनुष उठाना,
उसकी गति,
उसकी स्थिरता —
अर्जुन से कम नहीं थी।
शायद…
कुछ मामलों में अधिक।
वह दिन — जब सत्य सामने आया
एक दिन अर्जुन वन में अभ्यास कर रहा था।
एक कुत्ता आया।
कुछ ही क्षणों में
कुत्ते का मुँह तीरों से बंद था —
पर वह जीवित था।
अर्जुन चौंक गया।
“यह कौन कर सकता है?”
हम सब उस दिशा में गए।
वहीं एकलव्य खड़ा था।
सिर झुका हुआ।
धनुष हाथ में।
गुरु दक्षिणा — सबसे कठोर
मेरे पिता ने उससे पूछा—
“तुम्हारे गुरु कौन हैं?”
एकलव्य ने प्रतिमा की ओर संकेत किया—
“आप।”
मेरे पिता की आँखें क्षण भर के लिए काँपीं।
योगेश्वर,
उस क्षण मैंने पहली बार
अपने पिता को टूटते देखा।
क्योंकि एकलव्य ने
बिना अनुमति
उन्हें गुरु बना लिया था।
अंगूठे की माँग — धोखा या धर्म?
मेरे पिता ने कहा—
“यदि मैं तुम्हारा गुरु हूँ,
तो गुरु दक्षिणा दो।”
एकलव्य ने बिना सोचे
अपना अंगूठा काटकर दे दिया।
कोई चीख नहीं।
कोई प्रश्न नहीं।
बस श्रद्धा।
सच्चाई जो लोग नहीं समझते
लोग कहते हैं —
द्रोणाचार्य ने अन्याय किया।
पर सुनो —
यदि एकलव्य का अंगूठा न लिया जाता,
तो अर्जुन का आशीर्वाद झूठा हो जाता।
और यदि अर्जुन वह न बनता,
जो उसे बनना था —
तो कुरुक्षेत्र में
धर्म हार जाता।
यह निर्णय
क्रूर था।
पर यह निर्णय
रणनीतिक था।
अश्वत्थामा का स्वीकार
मैंने योगेश्वर से कहा—
“हाँ…
एकलव्य महान था।
और हाँ…
उसके साथ कठोरता हुई।”
मैं यह भी कहता हूँ—
“पर धोखा नहीं हुआ।
एकलव्य ने स्वयं अंगूठा दिया।”
और सबसे बड़ा सत्य—
“मेरे पिता उस दिन
गुरु नहीं रहे।
वे राज्य के सेवक बन गए।”
एकलव्य का स्थान — इतिहास में नहीं, आत्मा में
एकलव्य का नाम
राजवंशों में नहीं लिखा गया।
पर वह हर उस शिष्य की आत्मा में जीवित है
जो बिना मंच,
बिना मान्यता
तप करता है।
अंतिम वाक्य
मैंने अग्निवंश से कहा—
“योगेश्वर,
इतिहास कभी निष्पक्ष नहीं होता।
पर सत्य…
वह मौन रहता है।”
और आज…
मैंने वह मौन तोड़ा है।
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लेखक भगवत सिंह नरूका ✍️