रात को केक काट कर और सभी मेहमानों को खाना खिलाकर कल्पेश सिंह ने अपनी बेटी का जन्मदिन बड़ी ही धूमधाम से मनाया। सभी लोगों के जाने के बाद रात में लगभग 12 बजे के आसपास सभी काम से फ्री हुए और फिर थकान के मारे ऐसे ही अपने अपने कमरों में जाकर सो गए।
त्रिशा के जन्मदिन के एक हफ्ते बाद तक भी राजन के घरवालों की तरफ से कोई खबर ना आई थी जिससे सभी लोग कुछ चिंतित भी थे और खुद को समझा भी रहे थे कि ऐसे मामलों में जल्दबाजी नहीं की जाती है।
एक दिन रोजाना कि तरह सुबह के समय सभी लोग नाश्ते की टेबल पर मौजूद थे जहां कल्पेश, सुदेश, मानस और तन्मय बैठे नाश्ता कर रहे थे और त्रिशा और उसकी मां कल्पना उन्हें खाना परोस रहे थे। वहीं त्रिशा की मामी और उनकी बहू मोनिका किचन में काम देख रहे थे।
"और तन्मय तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है??" मानस ने तन्मय से पूछा।
"सही चल रही है भईया!!!!" तन्मय ने जवाब दिया।
"मन लगा कर पढ़ना इस साल तुम्हारी दसवीं है ना!!!!!" मानस ने कहा।
"हां भईया!!!" तन्मय ने हां में सिर हिला दिया।
"सिर तो इसने ऐसा हिलाया है जैसे सच में मन लगा कर पढ़ ही लेगा!!!!" त्रिशा ने हंसते हुए तन्मय को छेड़ते हुए कहा।
"हां मैं पढ़ ही लूंगा। और पढ़ लूंगा क्या मैं पढ़ता ही हूं!!!!!!" तन्मय ने अपने पिता की ओर देख कर सफाई देते हुए कहा।
"हां कान में इयरफोन लगा कर और गाना सुनते हुए पढ़ते हो ना तुम!!!!" त्रिशा ने झुक कर उसकी थाली में एक पराठा रखते हुए फुसफुसाते हुए कहा।
त्रिशा की बात सुन कर तन्मय ने उसकी ओर देखकर दांत दिखाते हुए कहा," मेरी प्यारी दीदी!!!!! पापा के आगे मत बोलना यह!!!!! प्लीज!!!!!"
त्रिशा ने अपने चेहरे पर विजय की मुस्कान के साथ उसे देखा कि तभी कल्पेश ने उन दोनों को देखते हुए अपनी कड़क आवाज में कहा," क्या खुसर फुसर चल रही है तुम दोनों मैं???"
"कुछ नहीं पापा!!!!! कुछ भी तो नहीं!!!!" त्रिशा और तन्मय दोनों एक साथ बोले।
कल्पेश कुछ बोलते की तभी उनका फोन बजने लगा और उन्होनें देखा तो यह राजन का ही नंबर था जो उन्होनें उस दिन सेव किया था। अपने फोन की स्क्रीन पर राजन का नाम देख कर वह सभी की ओर देखकर बोले," चुप हो जाओ सब राजन का फोन है!!!"
उनकी बात सुनकर सभी कल्पेश की ओर देखने लगे क्योंकि इस फोन का इंतजार तो वह सब एक हफ्ते से कर रहे थे। कल्पेश ने फोन उठाया और वह बात करने लगे। उनके फोन की आवाज धीमी होने के कारण किसी को भी कोई बात सुनाई ना दी।
जब किचन में काम करती त्रिशा की मामी ने सुना की राजन के यहां से फोन है तो वह भी किचन से बाहर आ गई और मोनिका ने भी अपने कान बाहर की ओर लगा लिए। वैसे सिर्फ मोनिका ही नहीं वहां पर मौजूद सभी लोग बस उनकी ओर देखने लगे। वह सभी बड़े ध्यान से सुनने लगे कि कल्पेश क्या बोल रहे है। लेकिन कल्पेश तो सिर्फ "हां जी!!!!
ठीक!!!!
ठीक है जी!!!!
जैसी आपकी मर्जी!!!
जी हमें क्या परेशानी होगी!!!!" बोल रहे थे।
कल्पेश ने जैसे ही फोन काटा तो सबसे रुका ना गया क्योंकि वह कुछ चिंतित नजर आ रहे थे। इसलिए सबसे पहले कल्पना ही उनके पास आई और उनकी ओर जाकर पूछने लगी," क्या हुआ जी??? क्या बोला उन्होनें???? क्या बात हुई आपकी उनसे??और अब परेशान क्यों लग रहे है जी???"
कल्पेश ने कल्पना की ओर देख कर कहा, "राजन की मां ने अपने पंडित को राजन और त्रिशा की कुंडलियां दिखाई थी और उन्होंने बोला कि यह रिश्ता शुभ रहेगा दोनों के 36 में से 26 गुण मिलते है तो यह रिश्ता अब पक्के वाला हां समझे!!!!!!"
"सच में??????" कल्पना ने खुशी से पूछा।
"हां सच में!!!!" कल्पेश ने जवाब दिया।
और उनकी यह बात सुन कर त्रिशा के मामा मामी उसके माता पिता को बधाई देने लगे और उसकी मां अपनी बेटी की नजर उतार उसका चेहरा खुशी से देखने लगी।
लेकिन कल्पेश अभी भी कुछ चिंतित दिखाई दे रहे थे और उन्हें यूं देख सुदेश ने पूछा," क्या बात है भाईसाहब??? रिश्ता पक्का होने की बात सुनने के बाद आप चिंता में क्यों है????"
सुदेश की बात सुनते ही सबका ध्यान एक बार पुन: कल्पेश की हो गया और वह सब उन्हें ही देखने लगे।
राजन की मां ने कहा कि रिश्ता तो पक्का हो गया है लेकिन पंडित ने शादी की तारीख चार महीने बाद की निकाली है। उनका कहना है कि उसके बाद अगले साल तक कोई मुहुर्त नहीं है।।और वो लोग नहीं चाहते की इतना इंतजार किया जाए इसलिए वो लोग चाहते है कि यह शादी चार महीने बाद वाले समय पर की जाए।।।
"क्या इतनी जल्दी?????" कल्पना ने चिंतित स्वर में कहा।
"शादी के लिए तो कितनी तैयारी करनी पड़ती है!!!!! कितना काम करना होता है!!!!! इतने कम समय में इतने सारे काम कैसे होगें????" कल्पना ने चिंतित होते हुए कहा।