Berang Ishq Gahra Pyaar - 2 in Hindi Love Stories by kajal jha books and stories PDF | बेरंग इश्क गहरा प्यार - एपिसोड 2

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बेरंग इश्क गहरा प्यार - एपिसोड 2

बेरंग इश्क, गहरा प्यार

एपिसोड 2: पहली सुबह की दस्तक

खन्ना मेंशन की सुबह वैसी नहीं थी जैसी पाखी ने अपने घर में देखी थी। वहां चिड़ियों की चहचहाहट और मंदिर की घंटियों से दिन शुरू होता था, लेकिन यहाँ की सुबह ठंडी और बेजान थी। भारी पर्दों के पीछे छिपी धूप कमरे में आने की जद्दोजहद कर रही थी।

पाखी की आँख खुली तो उसने खुद को बेड के एक कोने में सिमटा हुआ पाया। पास ही सोफे पर देब सो रहा था। सोते हुए उसके चेहरे पर वह कठोरता नहीं थी जो जागते समय रहती थी। उसके माथे पर एक हल्की सी शिकन थी, जैसे नींद में भी वह किसी युद्ध से लड़ रहा हो। पाखी का मन किया कि वह उन शिकनों को मिटा दे, पर उसने अपने हाथ पीछे खींच लिए। 'संभल जाओ पाखी, तुम यहाँ सिर्फ एक साल के लिए हो,' उसने खुद को समझाया।

वह धीरे से उठी और तैयार होकर नीचे किचन की तरफ बढ़ी। घर के नौकर उसे देख कर हैरान थे। खन्ना खानदान की बहुएँ किचन में नहीं आती थीं, लेकिन पाखी के लिए 'बहु' होने से ज्यादा 'बेटी' होना जरूरी था। उसने प्यार से मुस्कुराते हुए सबको किनारे किया और खुद चाय चढ़ा दी।

थोड़ी देर बाद देब नीचे आया। वह अपने ऑफिस के सूट में तैयार था, हाथ में फाइलें थीं और चेहरे पर वही चिर-परिचित गंभीरता। जैसे ही वह डाइनिंग टेबल पर बैठा, उसकी नाक में अदरक और इलायची वाली चाय की ताजी खुशबू गई। सालों से वह 'ब्लैक कॉफी' पीता आ रहा था, इस खुशबू ने उसकी इंद्रियों को एक झटके में जगा दिया।

पाखी ने बिना कुछ कहे उसके सामने कप रखा। "कॉफी आपकी सेहत के लिए ठीक नहीं है, कम से कम सुबह के वक्त तो नहीं।"

देब ने चाय के कप को ऐसे देखा जैसे वह कोई अजनबी चीज हो। उसने एक घूँट भरा। स्वाद उसकी उम्मीद से कहीं ज्यादा सुकून देने वाला था। "मैने कहा था पाखी, मेरे लाइफस्टाइल को बदलने की कोशिश मत करना।" उसकी आवाज सख्त थी, पर उसने कप वापस नहीं रखा।

"मैंने सिर्फ चाय दी है मिस्टर खन्ना, आपकी लाइफस्टाइल नहीं बदली," पाखी ने सहजता से जवाब दिया और अपने लिए नाश्ता परोसने लगी।

देब उसे देखता रह गया। उसकी सादगी और उसका आत्मविश्वास एक अजीब सा विरोधाभास पैदा कर रहे थे। वह नाश्ता छोड़कर उठ खड़ा हुआ। "मैं ऑफिस जा रहा हूँ। रात को देर होगी। ड्राइवर को बता देना अगर कहीं जाना हो तो।"

दिन बीतता गया। पाखी ने पूरा दिन घर को समझने में बिताया। उसने देखा कि घर के हर कोने में धूल जमी थी—सफाई की नहीं, बल्कि यादों की। देब के कमरे की एक दराज लॉक थी। पाखी की जिज्ञासा जगी, पर उसने खुद को रोक लिया। वह किसी के अतीत में बिना इजाजत कदम नहीं रखना चाहती थी।

शाम को बारिश शुरू हो गई। पाखी बालकनी में खड़ी बारिश की बूंदों को देख रही थी, जब उसने देब की गाड़ी को अंदर आते देखा। वह जल्दी घर आ गया था?

देब गाड़ी से उतरा, वह पूरी तरह भीगा हुआ था। जैसे ही वह अंदर आया, पाखी तौलिया लेकर दौड़ी। "आप पागल हैं? इतनी तेज बारिश में भीगने की क्या जरूरत थी?"

देब रुक गया। उसकी आँखों में एक अजीब सा गुस्सा और दर्द उभरा। उसने पाखी का हाथ झटक दिया। "मुझ पर अपना हक जताना बंद करो पाखी! यह शादी सिर्फ कागजों पर है। मेरी फिक्र करने की जरूरत नहीं है।"

पाखी की आँखों में पानी भर आया, पर उसने उसे गिरने नहीं दिया। उसने शांत स्वर में कहा, "हक नहीं जता रही हूँ। बस इंसानियत के नाते कह रही हूँ। अगर आप बीमार पड़े, तो अस्पताल का बिल आपके कॉन्ट्रैक्ट का हिस्सा नहीं था।"

देब उसकी बात सुनकर अवाक रह गया। इस लड़की के पास हर बात का जवाब था, पर उसमें कड़वाहट नहीं थी। वह बिना कुछ कहे अपने कमरे की तरफ बढ़ गया। रात को जब पाखी ने उसके कमरे के बाहर सूप का कटोरा रखा, तो उसने दरवाजा नहीं खोला। पर आधे घंटे बाद जब पाखी ने चुपके से देखा, तो कटोरा खाली था।

उस रात, देब को तेज बुखार आया। वह नींद में बड़बड़ा रहा था, "मुझे छोड़कर मत जाओ... मैंने क्या किया था?"

पाखी उसके पास बैठी, उसके माथे पर ठंडी पट्टियां रखती रही। उसने देखा कि देब की मुट्ठियाँ कसी हुई थीं। वह किसी बहुत पुराने डर से लड़ रहा था। पाखी ने धीरे से उसका हाथ अपने हाथों में लिया। देब की पकड़ ढीली हुई और वह शांत हो गया।

अंधेरी रात में, उस खामोश कमरे में, 'बेरंग' लग रहे इस रिश्ते में पहली बार हमदर्दी का एक रंग घुला था।

हुक:

अगली सुबह जब देब की आँख खुलेगी और वह पाखी को अपने पास सोया हुआ पाएगा, तो उसका रिएक्शन क्या होगा? क्या वह इस बढ़ती नजदीकी को स्वीकार करेगा या फिर से नफरत की

दीवार खड़ी कर देगा