सुबह के ठीक 5:00 बजे थे। खन्ना मेंशन के उस विशाल बेडरूम में हल्की-सी नीली रोशनी फैली हुई थी। देब की नींद अचानक खुल गई। वह कुछ पल यूँ ही छत को घूरता रहा, फिर करवट बदली… और तभी उसे एहसास हुआ— बिस्तर के दूसरे हिस्से पर कोई मौजूद है।
देब का शरीर पल भर के लिए सख़्त हो गया। उसने धीरे से सिर घुमाकर देखा। पाखी। वह एक छोटे बच्चे की तरह सिमटी हुई सो रही थी। उसके चेहरे पर नींद की मासूमियत थी, माथे पर हल्की शिकन और होंठ अधखुले। बीती रात की थकान अब भी उसके चेहरे पर झलक रही थी।
देब ने उसे गौर से देखा। न कोई शिकायत, न कोई मांग, न कोई बनावट। बस… एक शांत साँस लेती हुई लड़की। देब ने उसे जगाया नहीं, न ही वहाँ से हटने को कहा। वह चुपचाप उठा, फ्रेश हुआ और जिम चला गया— मानो वह अपने दिमाग को सोचने से रोकने के लिए शरीर को थकाना चाहता हो।
सुबह 7:00 बजे: एक अनचाही कॉल
जब पाखी की आँख खुली, तो घड़ी 7:05 बजा रही थी। वह हड़बड़ा कर उठी, “इतनी देर कैसे हो गई?” उसने जल्दी-जल्दी तैयार होकर कमरे में कदम रखा ही था कि टेबल पर रखा मोबाइल गूँज उठा। स्क्रीन पर एक 'Unknown Number' चमक रहा था।
कांपते हाथों से पाखी ने कॉल उठाई। "हेलो?"
उधर से एक सख़्त आवाज़ आई, "हेलो, क्या मैं पाखी मिश्रा से बात कर रहा हूँ? मैं दिल्ली पुलिस से इंस्पेक्टर रणबीर सिंह बोल रहा हूँ।"
पाखी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
"आपकी बहन राधिका मिश्रा इस वक्त हमारी हिरासत में है। कुछ विशेष परिस्थितियों के कारण उसे यहाँ लाना पड़ा। आप फौरन दिल्ली आ जाइए।"
पाखी की आवाज़ रुंध गई, "मेरी बहन ने क्या किया है सर?" लेकिन जवाब मिलने से पहले ही कॉल कट चुकी थी। पाखी का हाथ काँप रहा था, फोन हाथ से गिरने ही वाला था कि तभी देब ने कमरे में प्रवेश किया।
देब का फैसला
पाखी का चेहरा सफेद पड़ चुका था। देब ने उसे गौर से देखा और पूछा, “क्या हुआ?”
पाखी ने लड़खड़ाती ज़ुबान से सब बता दिया। देब ने एक पल भी नहीं गंवाया और संक्षिप्त आदेश दिया— “तैयार हो जाओ। हम अभी दिल्ली निकल रहे हैं।”
पाखी हैरान थी, "पर इतना लंबा रास्ता..."
देब ने सपाट लहजे में कहा, "हेलीकॉप्टर से चलेंगे, आधे घंटे में पहुँच जाएंगे।"
दिल्ली पुलिस स्टेशन: एक खौफनाक सच
करीब दो घंटे बाद, वे दिल्ली के एक पुलिस स्टेशन में थे। अंदर का माहौल काफी तनावपूर्ण था। वहाँ पाखी की नज़र एक लड़की पर पड़ी— गोरा रंग, गहरी आँखें और कंधों तक गिरते बिखरे हुए बाल। वह राधिका थी, जो बुरी तरह रो रही थी।
देब सीधा इंस्पेक्टर के पास पहुँचा। "राधिका को यहाँ क्यों रखा गया है?"
इंस्पेक्टर ने गंभीर होकर बताया, "कल रात एक हत्या हुई थी, जिसकी राधिका इकलौती चश्मदीद गवाह है। उसने कातिल का चेहरा देख लिया है और अब उसकी जान को खतरा है। सुरक्षा के लिहाज़ से हमने उसका ट्रांसफर मुंबई के कॉलेज में करवा दिया है। दिल्ली अब उसके लिए सुरक्षित नहीं है।"
बहनों का मिलन और एक अजीब रिश्ता
राधिका जैसे ही पाखी से मिली, वह उससे लिपटकर फूट-फूटकर रोने लगी। फिर उसकी नज़र पास खड़े देब पर पड़ी। उसने पाखी के कान में फुसफुसाया, "दीदी, ये कौन हैं? इतना खड़ूस चेहरा बनाकर कौन खड़ा रहता है?"
पाखी ने उसे टोकते हुए कहा, "तमीज़ से बात कर, ये तेरे जीजा जी हैं।"
राधिका की आँखें चमक उठीं। वह झट से देब के गले लग गई, "नमस्ते जीजा जी! मैं आपकी इकलौती और सबसे प्यारी साली हूँ!"
देब अपनी जगह अडिग खड़ा रहा, कोई भाव नहीं। उसने बस इतना कहा, "मैं जानता हूँ तुम राधिका हो। सामान लो, अब तुम हमारे साथ मुंबई चल रही हो।"
इतना कहकर वह बाहर निकल गया। राधिका उसे जाते देख बुदबुदाई, "अजीब इंसान हैं... दो मिनट प्यार से बात नहीं कर सकते क्या?"
उपसंहार
तीनों मुंबई के लिए रवाना हो चुके थे। पाखी को अंदाजा भी नहीं था कि जिस 'समझौते की शादी' से वह डर रही थी, वही रिश्ता आज उसकी बहन के लिए ढाल बन गया था। जो आदमी भावनाओं से दूर भागता था, उसने बिना एक सवाल किए एक नया रिश्ता और उसकी जिम्मेदारी अपना ली थी।