BAGHA AUR BHARMALI - 3 in Hindi Love Stories by Sagar Joshi books and stories PDF | BAGHA AUR BHARMALI - 3

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BAGHA AUR BHARMALI - 3

Chapter 3 — विवाह में षड्यंत्र और उसके विफल होने की घटना



शादी का शुभ दिन तय हुआ, और सूरज ढलने से पहले ही मारवाड़ के राव मालदेव अपनी शाही बारात के साथ जैसलमेर की ओर रवाना हुए।

जैसलमेर की रेतीली राहों पर जब वह बारात पहुँची, तो पूरे शहर में जैसे हलचल मच गई।


घोड़ों के गले में बँधी घंटियाँ दूर तक गूँज रही थीं।

हाथियों के माथे पर रंग-बिरंगी चित्रकारी चमक रही थी।

ऊँटों की लंबी कतारें, राजपूत सैनिकों की चमकती कवच—ऐसी शान-ओ-शौकत जैसलमेर ने पहले कभी नहीं देखी थी।


किले के बाहर फैला हुआ बारात का डेरा किसी छोटे—से नगर जैसा दिख रहा था।

लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी—बच्चे, बूढ़े, महिलाएँ… हर कोई बस एक झलक पाने को बेताब।

चौपालों पर, गलियों में, बाज़ार में—बारात के किस्से हवा की तरह फैल गए।


यह खबर आखिर किले तक पहुँची, और फिर उम्मादे के कानों तक भी।


उसके मन में भी कौतुहल जाग उठा।

लेकिन वह खुद को याद दिलाती है—“मैं दुल्हन हूँ, ऐसे बारात देखने कैसे जा सकती हूँ?”


कुछ पल वह दुविधा में रहती है, फिर अचानक उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आती है—

किले की सबसे ऊँची छत से पूरा शहर दिखता है। बारात भी दिख ही जाएगी।


उम्मादे धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ती है।

कई मंज़िलों के बाद वह किले की ऊपरी छत पर पहुँचती है—और नीचे फैली बारात का पहला दृश्य देखते ही ठिठक जाती है।


सैकड़ों मशालें हवा में लब रही हैं।

ढोल-नगाड़ों की थाप रात के आकाश में गूंज रही है।

चमकते कवचों और शाही छत्रों के बीच—राव मालदेव का रथ, जैसे चंद्रमा के चारों ओर सितारे घूम रहे हों।


उम्मादे उस दृश्य में खो जाती है।

कुछ देर तक बस देखती रहती है—उसके चेहरे पर हल्की विस्मय, हल्की घबराहट… दोनों का मिला-जुला रंग।


बारात देखने के बाद वह वापस नीचे उतरने लगती है।

तभी उसे नीचे की ओर किसी कमरे से ऊँची—गहरी आवाज़ें सुनाई देती हैं।


वह रुक जाती है।


ये आवाज़ उसके पिता रावल लूणकरण और माता की होती है।

दोनों किसी बात पर तीखी बहस कर रहे होते हैं।


उम्मादे धीरे से पास जाती है—दीवार के पीछे छुपकर सुनने लगती है।



लूणकरण कठोर स्वर में कह रहा होता है:


“आज जब मालदेव फेरे ले रहा होगा… उसी वक्त मैं उसे मार दूँगा।

यहीं, इसी किले में—और ये झगड़ा हमेशा के लिए खत्म।”


उम्मादे के पैरों से जैसे जमीन खिसक जाती है।


उसकी माँ घबराकर जवाब देती है:


“आप पागल हो गए हैं क्या? वो आपकी बेटी का होने वाला पति है!

आप अपनी ही बेटी का सुहाग उजाड़ देंगे?”


लूणकरण की आँखों में एक अजीब-सी जिद भरी होती है:


“तो क्या? अगर वो विधवा होगी… तो मैं उसे मालदेव के साथ sati करा दूँगा।

मैं ने निश्चय कर लिया है—अब तुम मुझसे बहस मत करो।”


ये सुनते ही उम्मादे के भीतर जैसे तूफान उठ खड़ा होता है।

उसके हाथ काँपने लगते हैं, साँसें तेज हो जाती हैं।


वह पीछे हटती है… दीवार से टिक जाती है।


उसकी आँखों में आँसू आ जाते हैं—

“एक तरफ पिता… जिन्होंने मुझे पाला।

और दूसरी तरफ मेरे होने वाले पति… जिसका जीवन मेरे कारण खतरे में है।

मैं किसका साथ दूँ?”


कुछ देर वह उसी सदमे में बैठी रहती है।

लेकिन धीरे-धीरे उसके अंदर का भ्रम टूटने लगता है—और उसकी जगह एक साफ, तेज रोशनी उभरती है।


वह खुद से कहती है:


“सगाई के बाद पति-धर्म प्रारम्भ हो जाता है।

मैं किसी अनुचित कृत्य की साक्षी नहीं बन सकती।

मुझे सच का साथ देना होगा।”


उसकी आवाज़ अंदर से बेहद स्थिर होती है—जैसे कोई राजकुमारी नहीं, एक धर्मनिष्ठ योद्धा बोल रही हो।


उम्मादे तुरंत अपने विश्वसनीय दूत को बुलाती है।

काँपते हाथों से एक पत्र लिखती है—पर शब्द पूरी दृढ़ता से भरे होते हैं:


“मालदेव जी, पिता आज रात आपकी हत्या की योजना बना रहे हैं।

फेरों के समय सावधान रहिए।”


दूत रात के उसी पहर मालदेव के डेरे की ओर निकल पड़ता है।


जब मालदेव पत्र पढ़ता है—वह हल्के से मुस्कुराता है।

उसके चहरे पर आश्चर्य नहीं—मानो उसे पहले से अंदाज़ा था की ऐसा कुछ हो सकता है।


लेकिन जिस बात ने उसे सच में प्रभावित किया—

वह था उम्मादे का साहस और उसका धर्म के प्रति समर्पण।


मालदेव अपने अंगरक्षकों को बुलाकर शांत स्वर में कहता है:


“जब फेरे शुरू हों… उस समय लूणकरण को वहीं से दूर ले जाना।

किसी तरह की हिंसा नहीं—बस उसे विवाह स्थल से अलग रखो।”


अगली सुबह बारात किले के अंदर पहुँचती है।

मशालें, मंत्र, ढोल—सब मिलकर किला किसी दिव्य लोक जैसा बना देते हैं।


उम्मादे मंडप में आती है—लेकिन उसके मन में कल रात की बातें अब भी चल रही हैं।

उसकी आँखों ने कई सच देखे हैं, पर उसका चेहरा स्थिर है।


फेरे शुरू होते ही—

मालदेव के अंगरक्षक चुपचाप लूणकरण को किसी बहाने से बाहर ले जाते हैं।


किले की गलियों से होते हुए उसे इतना दूर ले जाया जाता है कि वह कुछ भी न सुन सके, न देख सके।


और उधर—


विवाह बिना किसी बाधा के, पूरे वैभव और पवित्रता के साथ पूरा हो जाता है।


उम्मादे के मन में राहत और डर—दोनों का अजीब मेल है…

मगर एक बात साफ है—


उसने आज अपने धर्म, अपनी बुद्धि और अपने साहस से एक खून-खराबा रोक दिया।


आख़िरी मंत्र खत्म होते हैं।

मालदेव और उम्मादे सात फेरे पूरे कर चुके हैं।

किले के भीतर शुभ आशीर्वादों की आवाज़ें गूँज रही हैं—लेकिन उसी समय किले के बाहरी हिस्से में कोई और तूफान उठने वाला है।


लूणकरण, जिसे अंगरक्षक बहाने से बाहर ले गए थे, जैसे ही वापस लौटने की कोशिश करता है—दो राजपूत सैनिक उसे रोकते हैं।


वह भड़ककर पूछता है—


“मुझे रोका क्यों जा रहा है? मैं रावल लूणकरण हूँ!”


एक सैनिक विनम्रता से झुककर कहता है—


“रावल साहब, अंदर कुछ राजदरबारी तैयारी चल रही है।

आपका बुलावा आने पर ही प्रवेश होगा।”


लूणकरण यह सुनते ही तिलमिला उठता है।

उसकी आँखों में संदेह और बेचैनी दोनों तैर जाते हैं—


“तैयारी? ऐसी कौन सी तैयारी जिसमें दूल्हे की सजावट तो दिख रही है, पर पिता को अंदर जाने नहीं दिया जा रहा?”


वह सैनिकों को धक्का देकर भीतर घुसने की कोशिश करता है,

लेकिन राजपूतों ने आदेश का पालन करना था—

वे उसे रोक लेते हैं।


इस हंगामे के बीच मंत्रोच्चार की आवाज़ें तेज़ होती जाती हैं।

और कुछ ही क्षण बाद—किले के भीतर शंख बजता है।


विवाह सफलतापूर्वक पूर्ण हो चुका था।



शंख की आवाज़ सुनते ही लूणकरण के भीतर जैसे आग भड़क उठती है।

उसके चेहरे पर अपमान, असफलता और हैरानी का मिला-जुला रंग छा जाता है।


“तो ये मालदेव मुझसे चालाक बनता है?

मैंने उसे खत्म करने की सोची…

और वो मुझे ही किले से दूर रखकर मेरी बेटी से विवाह कर गया?”


उसकी मुट्ठियाँ कस जाती हैं।

लेकिन सैनिकों के

बीच खड़ा होकर वह कुछ कर भी नहीं सकता।


वह गुस्से से जमीन पर पांव पटकता है—

और उसी क्षण उसे एक और आभास होता है—


“इसमें किसी ने उसे चेताया है…

कौन था वो?”