ब्रह्मज्ञान हेतु लालायित एक धनी व्यक्ति के साथ बाबा ने किस प्रकार व्यवहार किया, इसका वर्णन हेमाडपंत ने गत दो अध्यायों में किया है। अब हेमाडपंत पर किस प्रकार बाबा ने अनुग्रह कर, उत्तम विचारों को प्रोत्साहन देकर उन्हें फलीभूत किया तथा आत्मोन्नति व परिश्रम के प्रतिफल के सम्बन्ध में किस प्रकार उपदेश किये, इनका इन दो अध्यायों में वर्णन किया जाएगा।
पूर्व विषय
यह विदित ही है कि सद्गुरु पहले अपने शिष्य की योग्यता पर विशेष ध्यान देते हैं। उनके चित्त को किंचित्मात्र भी डावाँडोल न कर वे उपयुक्त उपदेश देकर उन्हें आत्मानुभूति की ओर प्रेरित करते हैं। इस सम्बन्ध में कुछ लोगों का विचार है कि जो शिक्षा या उपदेश सद्गुरु द्वारा प्राप्त हो, उसे अन्य लोगों में प्रसारित न करना चाहिए। उनकी ऐसी भी धारणा है कि उसे प्रकट कर देने से उसका महत्व घट जाता है। यथार्थ में यथ दृष्टिकोण संकुचित है। सद्गुरु तो वर्षा ऋतु के मेघसदृश हैं, जो सर्वत्र एक समान बरसते हैं, अर्थात् वे अपने अमृततुल्य उपदेशों को विस्तृत क्षेत्र में प्रसारित करते हैं। प्रथमतः उनके सारांश को ग्रहण कर आत्मसात् कर लें और फिर संकीर्णता से रहित होकर अन्य लोगों में प्रचार करें। यह नियम जागृत और स्वप्न दोनों अवस्थाओं में प्राप्त उपदेशों के लिए है। उदाहरणार्थ बुधकौशिक ऋषि ने स्वप्न में प्राप्त प्रसिद्ध "रामरक्षा स्तोत्र" साधारण जनता के हितार्थ प्रगट कर दिया था।
जिस प्रकार एक दयालु माता, बालक के उपचारार्थ कड़वी औषधि का बलपूर्वक प्रयोग करती है, उसी प्रकार श्री साईबाबा भी अपने भक्तों के कल्याणार्थ ही उपदेश दिया करते थे। वे अपनी पद्धति गुप्त न रखकर पूर्ण स्पष्टता को ही अधिक महत्व देते थे । इसी कारण जिन भक्तों ने उनके उपदेशों का पूर्णतः पालन किया, वे अपने ध्येय की प्राप्ति में सफल हुए। श्री साईबाबा जैसे सद्गुरु ही ज्ञान चक्षुओं को खोलकर आत्मा की दिव्यता का अनुभव देने में समर्थ हैं। विषयवासनाओं से आसक्ति नष्ट कर वे भक्तों की इच्छाओं को पूर्ण कर देते हैं; जिसके फलस्वरूप ही ज्ञान और वैराग्य प्राप्त होकर, ज्ञान की उत्तरोत्तर उन्नति होती रहती है। यह सब केवल उसी समय सम्भव है, जब हमें सद्गुरु का सान्निध्य प्राप्त हो तथा सेवा के पश्चात् हम उनके प्रेम को प्राप्त कर सकें। तभी भगवान भी, जो भक्तकामकल्पतरु हैं, हमारी सहायतार्थ आ जाते हैं। वे हमें कष्टों और दुःखों से मुक्त कर सुखी बना देते हैं। यह सब प्रगति केवल सद्गुरु की कृपा से ही संभव है, जो कि स्वयं ईश्वर के प्रतीक हैं। इसीलिए हमें सद्गुरु की खोज में सदैव रहना चाहिए। अब हम मुख्य विषय की ओर आते हैं।
श्री साठे
एक महानुभाव का नाम श्री साठे था। क्राफर्ड के शासनकाल में कई वर्ष पूर्व, उन्हें कुछ ख्याति प्राप्त हो चुकी थी । इस शासन का बम्बई के गवर्नर लार्ड रे ने दमन कर दिया था। श्री साठे को व्यापार में अधिक हानि हुई और परिस्थितियाँ प्रतिकूल होने के कारण उन्हें बड़ा धक्का लगा । वे अत्यन्त दुःखित और निराश हो गए और अशान्त होने के कारण उन्हें घर छोड़कर किसी एकान्त स्थान मे वास करने का विचार करने लगे। बहुधा मनुष्यों को ईश्वर की स्मृति आपत्तिकाल तथा दुर्दिनों में ही आती है और उनका विश्वास भी ईश्वर की ओर ऐसे ही समय मे बढ़ जाता है। तभी वे कष्टों के निवारणार्थ उनसे प्रार्थना करने लगते है। यदि उनके पापकर्म शेष न रहे हों तो भगवान् भी उनकी भेंट किसी संत से करा देते हैं, जो उनके कल्याणार्थ ही उचित मार्ग का निर्देश कर देते हैं। ऐसा ही श्री साठे के साथ भी हुआ। उनके एक मित्र ने उन्हें शिरडी जाने की सलाह दी, जहाँ मन की शांति प्राप्त करने और इच्छा पूर्ति के निमित्त, देश के कोने-कोने से लोगों के झुंड के झुंड आ रहे हैं। उन्हें यह विचार अति रुचिकर प्रतीत हुआ और सन् १९१७ में वे शिरडी गए। बाबा के सनातन, पूर्ण-ब्रह्म, दीप्तिमान, निर्मल एवं विशुद्ध स्वरूप के दर्शन कर उनके मन की व्यग्रता नष्ट हो गई और उनका चित्त शान्त एवं स्थिर हो गया। उन्होंने सोचा कि गत जन्मों के संचित शुभ कर्मों के फलस्वरूप ही आज मैं श्री साईबाबा के पवित्र चरणों तक पहुँचने में समर्थ हो सका हूँ। श्री साठे दृढ़ संकल्प के व्यक्ति थे। इसलिये उन्होंने शीघ्र ही गुरुचरित्र का पारायण प्रारम्भ कर दिया। जब एक सप्ताह में ही चरित्र की प्रथम आवृत्ति समाप्त हो गई, तब बाबा ने उसी रात्रि को उन्हें एक स्वप्न दिया, जो इस प्रकार है:
बाबा अपने हाथ में चरित्र लिये हुए हैं और श्री साठे को कोई विषय समझा रहे हैं तथा श्री साठे सम्मुख बैठे ध्यानपूर्वक श्रवण कर रहे हैं। जब उनकी निद्रा भंग हुई तो स्वप्न को स्मरण कर वे बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने विचार किया कि यह बाबा की अत्यंत कृपा है, जो इस प्रकार अचेतनावस्था में पड़े हुओं को जागृत कर उन्हें “गुरुचरित्र” का अमृतपान करने का अवसर प्रदान करते हैं। उन्होंने यह स्वप्न श्री काकासाहेब दीक्षित को सुनाया और श्री साईबाबा के पास प्रार्थना करने को कहा कि इसका यथार्थ अर्थ क्या है और क्या एक सप्ताह का पारायण ही मेरे लिये पर्याप्त है अथवा उसे पुनः प्रारम्भ करूँ ? श्री काकासाहेब दीक्षित ने उचित अवसर पाकर बाबा से पूछा कि “हे देव ! उस दृष्टांत से आपने श्री साठे को क्या उपदेश दिया है ? क्या वे पारायण सप्ताह स्थगित कर दें ? वे एक सरलहृदय भक्त हैं। इसलिए उनकी मनोकामना आप पूर्ण करें और हे देव ! कृपा कर उन्हें इस स्वप्न का यथार्थ अर्थ भी समझा दें ।” तब बाबा बोले कि "उन्हें गुरुचरित्र का एक सप्ताह और पारायण करना उचित है। यदि वे ध्यानपूर्वक पाठ करेंगे तो उनका चित्त शुद्ध हो जाएगा और शीघ्र ही कल्याण होगा। ईश्वर भी प्रसन्न होकर उन्हें भवबन्धन से मुक्त कर देंगे।" इस अवसर पर श्री हेमाडपंत भी वहाँ उपस्थित थे और बाबा के चरणकमलों की सेवा कर रहे थे। बाबा के वचन सुनकर उन्हें विचार आया कि साठे को केवल सप्ताह के पारायण से ही मनोवांछित फल की प्राप्ति हो गई, जब कि मैं गत ४० वर्षों से “गुरुचरित्र” का पारायण कर रहा हूँ, जिसका परिणाम अब तक न निकला। उनका केवल सात दिनों का शिरडी निवास सफल हुआ और मेरा गत सात वर्ष का (१९१०-१७) सहवास क्या व्यर्थ हो गया ? चातक पक्षी के समान मैं सदा उस कृपाघन की राह देखा करता हूँ, जो मेरे ऊपर अमृतवर्षण करें। वे कब मुझे अपने उपदेश देने की कृपा करेंगे ? ऐसा विचार उनके मस्तिष्क में आया ही था कि बाबा को सब ज्ञात हो गया। ऐसा भक्तों ने सदैव ही अनुभव किया है कि उनके समस्त विचारों को जानकर बाबा तुरन्त कुविचारों का दमन कर उत्तम विचारो को प्रोत्साहित करते थे। हेमाडपंत का ऐसा विचार जानकर बाबा ने तुरन्त आज्ञा दी कि शामा के यहाँ जाओ और कुछ समय उनसे वार्तालाप कर १५ रुपये दक्षिणा ले आओ । बाबा को दया आ गई थी। इसी कारण उन्होंने ऐसी आज्ञा दी । उनकी अवज्ञा करने का साहस भी किसे था ? श्री हेमाडपंत शीघ्र शामा के घर पहुँचे। इस समय पर शामा स्नान कर धोती पहन रहे थे। उन्होंने बाहर आकर हेमाडपंत से पूछा कि, “आप यहाँ कैसे ? जान पड़ता है कि आप मस्जिद से ही आ रहे हैं तथा आप ऐसे व्यथित और उदास क्यों है ? आप अकेले ही क्यों आए हैं ? आइये, बैठिये और थोड़ा विश्राम तो करिये । जब तक मैं पूजनादि से भी निवृत्त हो जाँऊ, तब तक आप कृपा कर के पान आदि लें। इसके पश्चात् ही हम और आप सुखपूर्वक वार्तालाप करें।” ऐसा कहकर वे भीतर चले गए । दालान में बैठे-बैठे हेमाडपंत की दृष्टि अचानक खिड़की पर रखी “नाथ भागवत" पर पड़ी। “नाथ भागवत” श्री एकनाथ द्वारा महाभागवत के ११ वें स्कन्ध पर मराठी भाषा में की हुई एक टीका है। श्री साईबाबा की आज्ञानुसार श्री बापूसाहेब जोग और श्री काकासाहेब दीक्षित शिरडी में नित्य भगवद्गीता का मराठी टीकासहित, जिसका नाम भावार्थ दीपिका या ज्ञानेश्वरी है (कृष्ण और भक्त अर्जुन संवाद), नाथ भागवत (श्रीकृष्ण उद्धव संवाद) और एकनाथ का महान् ग्रन्थ भावार्थरामायण का पठन किया करते थे । जब भक्तगण बाबा से कोई प्रश्न पूछने आते तो वे कभी आंशिक उत्तर देते और कभी उनको उपर्युक्त भागवत तथा प्रमुख ग्रंथों का श्रवण करने को कहते थे, जिन्हें सुनने पर भक्तों को अपने प्रश्नों के पूर्णतया संतोषप्रद उत्तर प्राप्त हो जाते थे। श्री हेमाडपंत भी नित्य प्रति “नाथ भागवत” के कुछ अंशों का पाठ किया करते थे।
आज प्रातः मस्जिद को जाते समय कुछ भक्तों के सत्संग के कारण उन्होंने नित्य नियमानुसार पाठ अधूरा छोड़ दिया था। उन्होंने जैसे ही वह ग्रन्थ उठा कर खोला तो अपने अपूर्ण भाग का पृष्ठ सामने देखकर उनको आश्चर्य हुआ। उन्होंने सोचा कि बाबा ने इसी कारण ही मुझे यहाँ भेजा है, ताकि मैं अपना शेष पाठ पूरा कर लूँ और उन्होंने शेष अंश का पाठ आरम्भ कर दिया। पाठ पूर्ण होते ही शामा भी बाहर आए और उन दोनों में वार्तालाप होने लगा। हेमाडपंत ने कहा कि मैं बाबा का एक संदेश लेकर आपके पास आया हूँ। उन्होंने मुझे आपसे १५ रुपये दक्षिणा लाने तथा थोड़ी देर वार्तालाप कर आपको अपने साथ लेकर मस्जिद वापस आने की आज्ञा दी है। शामा आश्चर्य से बोले “मेरे पास तो एक फूटी कौड़ी भी नहीं है। इसलिये आप रुपयों के बदले दक्षिणा में मेरे पन्द्रह नमस्कार ही ले जाओ।" तब हेमाडपंत ने कहा कि, ठीक है, मुझे आपके पन्द्रह नमस्कार ही स्वीकार हैं। आइये, अब हम कुछ वार्तालाप करें, और कृपा कर बाबा की कुछ लीलाएँ आप मुझे सुनाएँ, जिससे पाप नष्ट हो । शामा बोले “तो कुछ देर बैठो। इस ईश्वर (बाबा) की लीला अद्भुत है । कहाँ मैं एक अशिक्षित देहाती और कहाँ आप एक विद्वान्, यहाँ आने के पश्चात् तो आप बाबा की अनेक लीलाएँ स्वयं देख ही चुके हैं, जिनका अब मैं आपके समक्ष कैसे वर्णन कर सकता हूँ ? अच्छा, यह पानसुपारी तो खाओ, तब तक मैं कपड़े पहन लूँ।”
थोडी देर में शामा बाहर आए और फिर दोनों में इस प्रकार वार्तालाप होने लगा:
शामा बोले — “इस परमेश्वर (बाबा) की लीलायें अगाध हैं, जिसका कोई पार नहीं । वे तो लीलाओं से अलिप्त रहकर सदैव विनोद किया करते है। इसे हम अज्ञानी जीव क्या समझ सकें ? बाबा स्वयं ही क्यों नही कहते ? आप सरीखे विद्वान् को मुझ जैसे मूर्ख के पास क्यों भेजा है? उनकी कार्यप्रणाली ही कल्पना के परे है। मैं तो इस विषय में केवल इतना ही कह सकता हूँ कि वे लौकिक नहीं है। इस भूमिका के साथ ही साथ शामा ने कहा कि अब मुझे एक की स्मृति हो आई है, जिसे मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ। जैसी भक्त की निष्ठा और भाव होता है, बाबा भी उसी प्रकार उनकी सहायता करते हैं। कभी-कभी तो बाबा भक्त की कठिन परीक्षा लेकर ही उसे उपदेश दिया करते हैं।" 'उपदेश' शब्द सुनकर साठे के गुरुचरित्रपारायण की घटना का तत्काल ही स्मरण करके हेमाडपंत को रोमांच हो आया । उन्होंने सोचा, कदाचित् बाबा ने मेरे चित्त की चंचलता नष्ट करने के लिये ही मुझे यहाँ भेजा है ? फिर भी वे अपने विचार प्रगट न कर, शामा की कथा को ध्यानपूर्वक सुनने लगे। उन सब कथाओं का सार केवल यही था कि अपने भक्तों के प्रति बाबा के मन में कितनी दया और स्नेह है। इन कथाओं को श्रवण कर हेमाडपंत को आंतरिक उल्लास का अनुभव होने लगा। तब शामा ने नीचे लिखी कथा कही :
श्रीमती राधाबाई देखमुख
एक समय एक वृद्धा, श्रीमती राधाबाई, जो खाशाबा देशमुख की माँ थीं, बाबा की कीर्ति सुनकर संगमनेर के लोगों के साथ शिरडी आई। बाबा के श्री दर्शन कर उन्हें अत्यन्त प्रसन्नता हुई। श्री साई-चरणों में उनकी अटल श्रद्धा थी। इसलिए उन्होंने यह निश्चय किया कि जैसे भी हो बाबा को अपना गुरू बनाकर, उनसे उपदेश ग्रहण किया जाए।
आमरण अनशन का दृढ़ निश्चय कर अपने विश्राम गृह में आकर उन्होंने अन्न-जल त्याग दिया और इस प्रकार तीन दिन व्यतीत हो गए। माधवराव देशपांडे इस वृद्धा की अग्निपरीक्षा से बिल्कुल भयभीत हो गया और बाबा से प्रार्थना करने लगा कि, "देवा! आपने अब यह क्या आरम्भ कर दिया है? ऐसे कितने लोगों को आप यहाँ आकर्षित किया करते हैं? आप उस वृद्ध महिला से पूर्ण परिचित ही हैं, जो हठपूर्वक आप पर अवलम्बित है। यदि आपने कृपादृष्टि कर उसे उपदेश न दिया और यदि दुर्भाग्यवश उसे कुछ हो गया तो लोग व्यर्थ ही आपको दोषी ठहरायेंगे और कहेंगे कि बाबा से उपदेश प्राप्त न होने की वजह से ही उसकी मृत्यु हो गई है। इसलिये अब दया कर उसे आशीष और उपदेश दीजिये।" वृद्धा का ऐसा दृढ़ निश्चय देख कर बाबा ने उसे अपने पास बुलाया और मधुर उपदेश देकर उसकी मनोवृत्ति परिवर्तित कर कहा कि, “हे माता ! क्यों व्यर्थ ही तुम यातना सहकर मृत्यु का आलिंगन करना चाहती हो ! तुम मेरी माँ और मैं तुम्हारा बेटा। तुम मुझ पर दया करो और जो कुछ मैं कहूँ, उसे ध्यानपूर्वक सुनो। मैं अपनी स्वयं की कथा तुमसे कहता हूँ, और यदि तुम उसे ध्यानपूर्वक श्रवण करोगी तो तुम्हें अवश्य परम शान्ति प्राप्त होगी। मेरे एक गुरु, जो बड़े सिद्ध पुरुष थे, मुझ पर बड़े दयालु थे। दीर्घ काल तक मैं उनसे कभी अलग होना भी नहीं चाहता था। मेरी प्रबल उत्कंठा थी कि उनकी सेवा कर जिस प्रकार भी सम्भव हो, मंत्र प्राप्त करूँ। परन्तु उनकी रीति न्यारी ही थी। उन्होंने पहले मेरा मुंडन कर मुझसे दो पैसे दक्षिणा में माँगे, जो मैंने तुरन्त ही दे दिये। यदि तुम प्रश्न करो कि मेरे गुरु जब पूर्ण निष्काम थे तो उन्हें पैसे माँगना क्या शोभनीय था ? और फिर उन्हें विरक्त भी कैसे कहा जा सकता था? इसका उत्तर केवल यह है कि वे कंचन को ठुकराया करते थे, क्योंकि उन्हें उसकी स्वप्न में भी आवश्यकता न थी । उन दो पैसों का अर्थ था (१) दृढ़ निश्चय और (२) धैर्य। जब मैंने ये दोनों वस्तुएँ उन्हें अर्पित कर दीं तो वे अत्यन्त प्रसन्न हुए। मैंने बारह वर्ष उनके श्री चरणों की सेवा में ही व्यतीत किये। उन्होंने ही मेरा भरण-पोषण किया। अतः मुझे भोजन और वस्त्रों का कोई अभाव न था । वे प्रेम की मूर्ति थे अथवा यों कहो कि वे प्रेम के साक्षात् अवतार थे। मैं उनका वर्णन ही कैसे कर सकता हूँ, क्योंकि उनका तो मुझ पर अधिक स्नेह था और उनके समान कोई बिरला ही गुरु मिलेगा । जब मैं उनकी ओर निहारता तो मुझे ऐसा प्रतीत होता कि वे गम्भीर मुद्रा में ध्यानमग्न हैं और तब हम दोनों आनंदित हो जाते थे। आठों प्रहर मैं एकटक उनके ही श्रीमुख की ओर निहारा करता था। मैं भूख और प्यास की सुध-बुध खो बैठा। उनके दर्शनों के बिना मैं अशांत हो उठता था। गुरु सेवा की चिन्ता के अतिरिक्त मेरे लिए और कोई चिन्तनीय विषय या पदार्थ नहीं था। मुझे तो सदैव उन्हीं का ध्यान रहता था। अतः मेरा मन उनके चरणकमलों में लीन हो गया । यह हुई एक पैसे की दक्षिणा। धैर्य है दूसरा पैसा। मैं धैर्यपूर्वक बहुत काल तक प्रतीक्षा कर गुरुसेवा करता रहा । यही धैर्य तुम्हें भी भवसागर से पार उतार देगा। धैर्य ही मनुष्य में मनुष्यत्व है । धैर्य धारण करने से समस्त पाप और मोह नष्ट होकर उनके हर प्रकार के संकट दूर होते तथा भय जाता रहता है । इसी प्रकार तुम्हें भी अपने ध्येय की प्राप्ति हो जाएगी । धैर्य तो गुणों की खदान व उत्तम विचारों की जननी है। निष्ठा और धैर्य दो जुड़वा बहनों के समान ही हैं, जिनमें परस्पर प्रगाढ़ प्रेम है ।"
“मेरे गुरु मुझसे किसी वस्तु की आकांक्षा न रखते थे । उन्होंने कभी मेरी उपेक्षा न की, वरन् सदैव रक्षा करते रहे। यद्यपि मैं सदैव उनके चरणों के समीप ही रहता था, फिर भी कभी किन्हीं अन्य स्थानों पर यदि चला जाता तो भी मेरे प्रेम में कभी कमी न हुई। वे सदा मुझ पर कृपादृष्टि रखते थे। जिस प्रकार कछुवी प्रेमदृष्टि से अपने बच्चों का पालन करती है, चाहे वे उसके समीप हों अथवा नदी के उस पार। सो हे माँ! मेरे गुरु ने तो मुझे कोई मंत्र सिखलाया ही नहीं, तब मैं तुम्हारे कान में कैसे कोई मंत्र फूँकूँ ? केवल इतना ही ध्यान रखो कि गुरु की भी कछुवी के समान ही प्रेम-दृष्टि से हमें संतोष प्राप्त होता है। इस कारण व्यर्थ में किसी से उपदेश प्राप्त करने का प्रयत्न न करो। मुझे ही अपने विचारों तथा कर्मों का मुख्य ध्येय बना लो और तब तुम्हें निस्संदेह ही परमार्थ की प्राप्ति हो जाएगी। मेरी ओर अन्य भाव से देखो तो मैं भी तुम्हारी ओर वैसे ही देखूँगा । इस मस्जिद में बैठकर मैं सत्य ही बोलूँगा कि किन्हीं साधनाओं या शास्त्रों के अध्ययन की आवश्यकता नहीं, वरन् केवल गुरु में विश्वास ही पर्याप्त है । पूर्ण विश्वास रखो कि गुरु ही कर्ता है और वह धन्य है, जो गुरु की महानता से परिचित हो उसे हरि, हर और ब्रह्म (त्रिमूर्ति) का अवतार समझा जाता है ।"
इस प्रकार समझाने से वृद्ध महिला को सान्त्वना मिली और उसने बाबा को नमन कर अपना उपवास त्याग दिया । यह कथा ध्यानपूर्वक एकाग्रता से श्रवण कर तथा उसके उपयुक्त अर्थ पर विचार कर हेमाडपंत को बड़ा आश्चर्य हुआ । उनका हृदय भर आया और उन्हें रोमांच हो उठा । अत्यंत आनन्दविभोर हो जाने से उनका कंठ रूँध गया और वे मुख से एक शब्द भी न बोल सके। उनकी ऐसी स्थिति देख शामा ने पूछा कि, “आप ऐसे स्तब्ध क्यों हो गए ? बात क्या है? बाबा की तो इस प्रकार की लीलाएँ अगणित हैं, जिनका वर्णन मैं किस मुख से करूँ ?"
ठीक उसी समय मस्जिद में घण्टानाद होने लगा, जो कि मध्याह्न पूजन तथा आरती के आरम्भ का द्योतक था। तब शामा और हेमाडपंत भी शीघ्र ही मस्जिद की ओर चले । बापूसाहेब जोग ने पूजन आरम्भ कर दिया था, स्त्रियाँ मस्जिद में ऊपर खड़ी थीं और पुरुष वर्ग नीचे मंडप में। सब उच्च स्वर में वाद्यों के साथ-साथ आरती गा रहे थे। तभी हेमाडपंत का हाथ पकड़े हुए शामा भी ऊपर पहुँचे और वे बाबा के दाहिनी ओर तथा हेमाडपंत बाबा के सामने बैठ गए। उन्हें देख बाबा ने शामा से लायी हुई दक्षिणा देने के लिये कहा । तब हेमाडपंत ने उत्तर दिया कि रुपयों के बदले शामा ने मेरे द्वारा आपको पन्द्रह नमस्कार भेजे हैं तथा स्वयं ही यहाँ आकर उपस्थित हो गए है। बाबा ने कहा, "अच्छा, ठिक है। तो अब मुझे यह बताओ कि तुम दोनों में आपस में किस विषय पर वार्तालाप हुआ है?" तब घंटे, ढोल और सामूहिक गान की ध्वनि की चिंता न करते हुए हेमाडपंत उत्कंठापूर्वक उन्हें वह वार्तालाप सुनाने लगे। बाबा भी सुनने को अति उत्सुक थे। इसलिये वे तकिया छोड़कर थोड़ा आगे झुक गए। हेमाडपंत ने कहा कि वार्ता अति सुखदायी थी, विशेषकर उस वृद्ध महिला की कथा तो ऐसी अद्भुत थी कि जिसे श्रवण कर मुझे तुरन्त ही विचार आया कि आपकी लीलाएँ अगाध हैं और इस कथा की ही ओट में आपने मुझ पर विशेष कृपा की है। तब बाबा ने कहा, वह तो बहुत ही आश्चर्यपूर्ण हैं। अब मेरी तुम पर कृपा कैसे हुई, इसका पूर्ण विवरण सुनाओ। कुछ काल पूर्व सुना वार्तालाप जो उनके हृदय पटल पर अंकित हो चुका था, वह सब उन्होंने बाबा को सुना दिया । वार्ता सुनकर बाबा अति प्रसन्न हो कहने लगे कि, “क्या कथा से प्रभावित होकर उसका अर्थ भी तुम्हारी समझ में आया है?" तब हेमाडपंत ने उत्तर दिया कि, “हाँ बाबा, आया तो है। उससे मेरे चित्त की चंचलता नष्ट हो गई है। अब यथार्थ में मैं वास्तविक शांति और सुख का अनुभव कर रहा हूँ तथा मुझे सत्य मार्ग का पता चल गया है।" तब बाबा बोले, “सुनो, मेरी पद्धति भी अद्वितीय है । यदि इस कथा का स्मरण रखोगे तो यह बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी । आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिये ध्यान अत्यंत आवश्यक है और यदि तुम इसका निरन्तर अभ्यास करते रहोगे तो कुप्रवृत्तियाँ शांत हो जाएँगी। तुम्हें आसक्तिरहित होकर सदैव ईश्वर का ध्यान करना चाहिए, जो सर्व प्राणियों में व्याप्त है और जब इस प्रकार मन एकाग्र हो जाएगा तो तुम्हें ध्येय की प्राप्ति हो जाएगी। मेरे निराकार सच्चिदानन्द स्वरूप का ध्यान करो, जैसे कि तुम मुझे दिन-रात यहाँ देखते हो। इस प्रकार तुम्हारी वृत्तियाँ केन्द्रित हो जाएँगी तथा ध्याता, ध्यान और ध्येय का पृथकत्व नष्ट हो, ध्याता चैतन्य से एकत्व को प्राप्त कर ब्रह्म के साथ अभिन्न हो जाएगा। कछुवी नदी के इस किनारे पर रहती है और उसके बच्चे दूसरे किनारे पर । न वह उन्हें दूध पिलाती है और न हृदय से ही लगाकर लेती है, वरन् केवल उसकी प्रेमदृष्टि से ही उनका भरण-पोषण हो जाता है। छोटे बच्चे भी कुछ न करके केवल अपनी माँ का ही स्मरण करते रहते हैं। उन छोटे-छोटे बच्चों पर कछुवी की केवल दृष्टि ही उन्हें अमृततुल्य आहार और आनन्द प्रदान करती है। ऐसा ही गुरु और शिष्य का भी सम्बन्ध है।” बाबा ने ये अंतिम शब्द कहे ही थे कि आरती समाप्त हो गई और सबने उच्च स्वर से - “श्री सच्चिदानन्द सद्गुरु साईनाथ महाराज की जय" बोला। प्रिय पाठकों ! कल्पना करो कि हम सब भी इस समय उसी भीड़ और जयजयकार में सम्मिलित हैं।
आरती समाप्त होने पर प्रसाद वितरण हुआ । बापूसाहेब जोग हमेशा की तरह आगे बढ़े और बाबा को नमस्कार कर मुठ्ठीभर मिश्री का प्रसाद बाबाको दिया । यह मिश्री हेमाडपंत को देकर वे बोले कि, “यदि तुम इस कथा को अच्छी तरह से सदैव स्मरण रखोगे तो तुम्हारी भी स्थिति इस मिश्री के समान मधुर होकर समस्त इच्छाएँ पूर्ण हो जाएँगी ओर तुम सुखी हो जाओगे।” हेमाडपंत ने बाबा को साष्टांग प्रणाम किया और स्तुति की कि, “प्रभो ! इसी प्रकार दया कर सदैव मेरी रक्षा करते रहो।" तब बाबा ने आशीर्वाद देकर कहा कि, "इन कथाओं को श्रवण कर, नित्य मनन तथा निदिध्यासन कर, तत्व ग्रहण करो, तब तुम्हें ईश्वर का सदा स्मरण तथा ध्यान बना रहेगा और वह स्वयं तुम्हारे समक्ष अपने स्वरूप को प्रकट कर देगा।” प्यारे पाठकों ! हेमाडपंत को उस समय मिश्री का प्रसाद भली-भाँति मिला, जो आज हमें इस कथामृत के पान करने का अवसर प्राप्त हुआ। आओ, हम भी उस कथा का मनन करें तथा उसका सार ग्रहण कर बाबा की कृपा से स्वस्थ और सुखी हो जाएँ ।
१९ वें अध्याय के अन्त में हेमाडपंत ने कुछ और भी विषयों का वर्णन किया है, जो यहाँ दिये जाते हैं ।
अपने बर्ताव के सम्बन्ध में बाबा का उपदेश
नीचे दिये हुए अमूल्य वचन सर्वसाधारण भक्तों के लिये हैं और यदि उन्हें ध्यान मे रखकर आचरण में लाया गया तो सदैव ही कल्याण होगा। जब तक किसी से कोई पूर्व नाता या सम्बन्ध न हो, तब तक कोई किसी के समीप नहीं जाता। यदि कोई मनुष्य या प्राणी तुम्हारे समीप आए तो उसे घृणासे न ठुकराओ। उसका स्वागत कर आदरपूर्वक बर्ताव करो। यदि तृषित को जल, क्षुधा पीड़ित को भोजन, नंगे को वस्त्र और आगन्तुक को अपना दालान विश्राम करने को दोगे तो भगवान् श्रीहरि तुमसे निस्सन्देह प्रसन्न होंगे। यदि कोई तुमसे द्रव्य-याचना करे और तुम्हारी इच्छा देने की न हो तो न दो, परन्तु उसके साथ अभद्र व्यवहार न करो। तुम्हारी कोई कितनी ही निंदा क्यों न करे, फिर भी कटु उत्तर देकर तुम उस पर क्रोध न करो। यदि इस प्रकार ऐसे प्रसंगो से सदैव बचते रहे तो यह निश्चित ही है कि तुम सुखी रहोगे। संसार चाहे उलट-पलट हो जाए, परन्तु तुम्हें स्थिर रहना चाहिए। सदा अपने स्थान पर दृढ़ रहकर गतिमान दृश्य को शान्तिपूर्वक देखो। एक को दूसरे से अलग रखने वाले भेद (द्वैत) की दीवार नष्ट कर दो, जिससे अपना मिलन-पथ सुगम हो जाए। द्वैत भाव (अर्थात् मैं और तू) ही भेद-वृत्ति है, जो शिष्य को अपने गुरु से पृथक् कर देती है। इसलिये जब तक इसका नाश न हो जाए, तब तक अभिन्नता प्राप्त करना सम्भव नहीं है। “अल्लाह मालिक" अर्थात् ईश्वर ही सर्वशक्तिमान् है और उसके सिवा अन्य कोई संरक्षणकर्ता नहीं है । उनकी कार्यप्रणाली अलौकिक, अनमोल और कल्पना से परे है। उनकी इच्छा से ही सब कार्य होते हैं। वे ही मार्ग-प्रदर्शन कर सभी इच्छाएँ पूर्ण करते हैं। ऋणानुबन्ध के कारण ही हमारा समागम होता है, इसलिये हमें परस्पर प्रेम कर एक दूसरे की सेवा कर सदैव सन्तुष्ट रहना चाहिए। जिसने अपने जीवन का ध्येय (ईश्वर दर्शन) पा लिया है, वही धन्य और सुखी है। दूसरे तो केवल कहने को ही जब तक प्राण हैं, तब तक जीवित हैं।
उत्तम विचारों को प्रोत्साहन
यह ध्यान देने योग्य बात है कि श्री साईबाबा सदैव उत्तम विचारों को प्रोत्साहन दिया करते थे । इसलिये यदि हम प्रेम और भक्तिपूर्वक अनन्य भाव से उनकी शरण जाएँ तो हमें अनुभव हो जाएगा कि वे अनेक अवसरों पर हमे किस प्रकार सहायता पहुँचाते है ? किसी संत का कथन है कि यदि प्रातःकाल तुम्हारे हृदय में कोई उत्तम विचार उत्पन्न हो और यदि तुम उसका स्मरण दिनभर करो तो वह तुम्हारा विवेक अत्यन्त विकसित और चित्त प्रसन्न कर देगा । हेमाडपंत भी इसका अनुभव करना चाहते थे। इसलिये इस पवित्र शिर्डी भूमि पर अगले गुरुवार के समूच दिन नामस्मरण और कीर्तन में ही व्यतीत करूँ, ऐसा विचार कर वे सो गये। दूसरे दिन प्रातःकाल उठने पर उन्हें सहज ही राम-नाम का स्मरण हो आया, जिससे वे प्रसन्न हुए और नित्य कर्म समाप्त कर कुछ पुष्प लेकर बाबा के दर्शन करने गए। जब वे दीक्षित वाड़ा पर कर बूटी-वाड़े के समीप से जा रहे थे तो उन्हें एक मधुर भजन की ध्वनि, जो मस्जिद की ओर से आ रही थी, सुनाई पड़ी। एकनाथ का यह भजन औरंगाबादकर मधुर लयपूर्वक बाबा के समक्ष गा रहे थे—
गुरुकृपा अंजन पायो मेरे भाई। राम बिना कुछ मानत नाहीं || धृ ||
अन्दर रामा बाहर रामा। सपने में देखत सीताराम ।। १ ।। गुरु.।। जागत रामा सोवत रामा। जहाँ देखे वहीं पूरन कामा ।। २ ।। गुरु.।।
एका जनार्दनी अनुभव नीका। जहाँ देखे वहाँ रामसरीखा ।। ३ ।। गुरु.।।
भजन अनेकों हैं, परन्तु विशेषकर यह भजन ही क्यों औरंगाबादकर ने चुना? क्या यह बाबा द्वारा ही संयाजित विचित्र अनुरूपता नहीं है? और क्या यह हेमाडपंत के पिछले दिन अखंड रामनाम स्मरण के संकल्प को प्रोत्साहन देना नहीं है? सभी संतों का इस सम्बन्ध में एक ही मत है और सभी रामनाम के जाप को प्रभावकारी तथा भक्तों की इच्छापूर्ति और सभी कष्टों से छुटकारा पाने के लिये इसे एक अमोघ उपाय बतलाते हैं।
निन्दा सम्बन्धी उपदेश
उपदेश देने के लिये किसी विशेष समय या स्थान की प्रतिक्षा न कर बाबा यथायोग्य समय पर ही स्वतन्त्रतापूर्वक उपदेश दिया करते थे। एक बार एक भक्त ने बाबा की अनुपस्थिति में दूसरे लोगों के सम्मुख किसी की निंदा की। गुणों की उपेक्षा कर उसने अपने भाई के दोषारोपण में इतने बुरे कटु वाक्यों का प्रयोग किया कि सुननेवालों को भी उसके प्रति घृणा होने लगी। बहुधा देखने में आता है कि लोग व्यर्थ ही दूसरों की निंदा कर झगड़ा और बुराइयाँ उत्पन्न करते हैं। संत तो निंदा को दूसरी ही दृष्टि से देखा करते हैं । उनका कथन है कि शुद्धि के लिये अनेक विधियों में मिट्टी, जल और साबुन पर्याप्त है, परन्तु निंदा करने वालों की उपयोगिता भिन्न ही होती है। वे दूसरों के दोषों को केवल अपनी जिह्वा से ही दूर करते हैं और इस प्रकार वे दूसरों की निंदा कर उनका उपकार ही किया करते हैं, जिसके लिये वे धन्यवाद के पात्र है'। निंदक को उचित मार्ग पर लाने के लिये साईबाबा की पद्धति सर्वथा ही भिन्न थी । वे तो सर्वज्ञ थे ही, इसलिये उस निंदक के कार्य को वे समझ गए । मध्याह्नकाल में जब लेण्डी (शिरडी गांवके पाससे बहनेवाला नाला) के समीप उससे भेंट हुई, तब उन्होंने विष्ठा खाते हुए एक सुअर की ओर उँगली उठाकर उससे कहा कि “देखो, वह कितने प्रेमपूर्वक विष्ठा खा रहा है। तुम जी भरकर अपने भाईयों को सदा अपशब्द कहा करते हो और यह तुम्हारा आचरण भी ठीक उसी के सदृश ही है। अनेक शुभ कर्मों के परिणामस्वरूप ही तुम्हें मानव-तन प्राप्त हुआ और इसलिये यदि तुमने इसी प्रकार आचरण किया तो शिरडी तुम्हारी सहायता क्या कर सकेगी ?" भक्त ने उपदेश ग्रहण कर लिया और वहाँ से चला गया। इस प्रकार प्रसंगानुसार ही वे उपदेश दिया करते थे। यदि उन पर ध्यान देकर नित्य उनका पालन किया जाए तो आध्यात्मिक ध्येय अधिक दूर न होगा। एक कहावत प्रचलित है कि – “यदि मेरा श्रीहरि होगा तो वह मुझे चारपाई पर बैठे-बैठे ही भोजन पहुँचायेगा ।” यह कहावत भोजन और वस्त्र के विषय में सत्य प्रतीत हो सकती है, परन्तु यदि कोई इस पर विश्वास कर आलस्यवश बैठा रहे तो वह आध्यात्मिक क्षेत्र में कुछ भी प्रगति न कर उलटे पतन के घोर अंधकार में निमग्न हो जाएगा। इसलिये आत्मानुभूति-प्राप्ति के लिये प्रत्येक को अनवरत परिश्रम करना चाहिए और जितना प्रयत्न वह करेगा, उतना ही उसके लिए लाभप्रद भी होगा । बाबा ने कहा कि “मैं तो सर्वव्यापी हूँ और विश्व के समस्त भूतों तथा चराचर में व्याप्त रहकर भी अनंत हूँ।” केवल उनके भ्रम-निवारणार्थ ही जिनकी दृष्टि में वे साढ़े-तीन हाथ के मानव थे, स्वयं सगुण रूप धारण कर अवतीर्ण हुए । इसलिये जो भक्त अनन्य भाव से उनकी शरण आए और जिन्होंने दिन-रात ही उनका ध्यान किया, उन्हें उनसे अभिन्नता प्राप्त हुई, जिस प्रकार कि माधुर्य और मिश्री, लहर और समुद्र तथा नेत्र और कांति मे अभिन्नता हुआ करती है। जो आवागमन के चक्र से मुक्त होना चाहें, वे शांत और स्थिर होकर अपना धार्मिक जीवन व्यतीत करें। दुःखदायी कटु शब्दों के प्रयोग से किसी को दुःखित न कर सदैव उत्तम कार्यों में संलग्न रहकर अपना कर्तव्य करते हुए अनन्य भाव से भयरहित हो उनकी शरण में जाना चाहिए । जो पूर्ण विश्वास से उनकी लीलाओं का श्रवण कर उनका मनन करेगा तथा अन्य वस्तुओं की चिंता त्याग देगा, उसे निस्संदेह ही आत्मानुभूति की प्राप्ति होगी। उन्होंने अनेकों से नाम का जापकर अपनी शरण में आने को कहा। जो यह जानने को उत्सुक थे कि “मै कौन हूँ ?” बाबा ने उन्हें भी लीलाएँ श्रवण और मनन करने का परामर्श दिया। किसी को भगवत् लीलाओं का श्रवण, किसी को भगवत्पादपूजन तो किसी को अध्यात्मरामायण व ज्ञानेश्वरी तथा धार्मिक ग्रन्थों का पठन एवं अध्ययन करने को कहा। अनेकों को अपने चरणों के समीप ही रखकर बहुतों को खंडोबा (शिवअवतार) के मन्दिर मे भेजा तथा अनेकों को विष्णु सहस्त्रनाम का जाप करने व छान्दोग्य उपनिषद् तथा गीता का अध्ययन करने को कहा। उनके उपदेशों की कोई सीमा न थी। उन्होंने किन्हीं को प्रत्यक्ष और बहुतों को स्वप्न में दृष्टांत दिये। एक बार वे एक मदिरा-सेवी के स्वप्न में प्रगट होकर उसकी छाती पर चढ़ गए और जब उसने मद्यपान त्यागने की शपथ खाई, तभी उसे छोड़ा। किसी-किसी को मंत्र ,जैसे “गुरुर्ब्रह्मा” आदि का अर्थ स्वप्न मे समझाया तथा कुछ हठयोगियों को हठयोग छोड़ने का निर्देश देकर चुपचाप बैठ धैर्य रखने को कहा। उनसे सुगम पथ और विधि का वर्णन ही असम्भव है। साधारण सांसारिक व्यवहारों में उन्होंने अपने आचरण द्वारा ऐसे अनेकों उदाहरण प्रस्तुत किये, जिनमें से एक यहाँ नीचे दिया जाता है।
परिश्रम के लिये मजदूरी
एक दिन बाबा ने राधाकृष्णमाई के घर के समीप आकर एक सीढ़ी लाने को कहा। तब एक भक्त सीढ़ी ले आया और उनके बतलाये अनुसार वामन गोंदकर के घर पर उसे लगाया। वे उनके घर पर चढ़ गए और राधाकृष्णमाई के छप्पर पर से होकर दूसरे छोर से नीचे उतर आए। इसका अर्थ किसी की समझ में न आया। राधाकृष्णमाई इस समय ज्वर से काँप रही थीं। इसलिये हो सकता है कि उनका ज्वर दूर करने के लिये ही उन्होंने ऐसा किया हो । नीचे उतरने के पश्चात् शीघ्र ही उन्होंने सीढ़ी लाने वाले को दो रुपये पारिश्रमिक स्वरूप दिये। तब एक ने साहस कर उनसे पूछा कि इतने अधिक पैसे देना क्या अर्थ रखता हैं? उन्होंने कहा कि किसी से बिना उसके परिश्रम का मूल्य चुकाये कार्य न कराना चाहिए और कार्य करने वाले को उसके श्रम का शीघ्र निपटारा कर उदार हृदय से मजदूरी देनी चाहिए।