भाग 4: आत्मविश्वास की नई दिशा
काव्या के लिए विश्वविद्यालय का जीवन अब पहले से कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गया था। हर दिन कुछ नया सीखने को मिलता, और साथ ही संघर्ष की भी नई राहें सामने आतीं। कभी-कभी लगता जैसे वह इस दुनिया में अकेली हो, लेकिन फिर उसकी मुलाकात अमृता और सुमित से हुई, और इन दोनों ने उसे दिखाया कि यह सफर अकेला नहीं था।
वह जब भी किसी कठिनाई का सामना करती, सुमित की वह बात याद आती—"तुम्हारे अंदर बहुत ताकत है, तुम्हें बस उसे पहचानने की जरूरत है।" इस एक वाक्य ने काव्या के दिल में आत्मविश्वास का दीप जलाया था। वह जानती थी कि यह सफर लंबा और कठिन होगा, लेकिन अगर उसने अपने भीतर की ताकत को पहचाना, तो वह किसी भी मुश्किल को पार कर सकती थी।
काव्या ने अब अपनी पढ़ाई में भी गहरी रुचि लेना शुरू कर दिया था। पहले जहां उसे विश्वविद्यालय का माहौल नया और मुश्किल लगता था, अब वह धीरे-धीरे इस माहौल से घुलने-मिलने लगी थी। वह अपनी परियोजनाओं पर पहले से ज्यादा मेहनत करती और समय पर अपनी किताबें पढ़ने के लिए रात-रात भर जागती। लेकिन इसका असर धीरे-धीरे दिखने लगा था।
एक दिन काव्या को उसके एक प्रोजेक्ट पर सबसे अच्छे अंक मिले, और यह उसका आत्मविश्वास बढ़ाने वाला पल था। "मैं यह कर सकती हूँ," उसने खुद से कहा और वह मुस्कराते हुए अपने कमरे में वापस चली गई।
लेकिन काव्या का संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ था। अब उसे कुछ और चीजों का सामना करना था—विशेष रूप से समाज की नज़रों में लड़कियों की स्थिति को लेकर।
नए संघर्ष, नए सवाल
काव्या के लिए एक और चुनौती सामने आई जब वह एक कॉलेज इवेंट के लिए आवेदन करने गई। यह इवेंट उन छात्रों के लिए था जो शैक्षिक और सामाजिक कार्यों में अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे। काव्या ने भी अपने नाम का पंजीकरण कराया, लेकिन जब वह आयोजन समिति के पास पहुँची, तो उन्हें उसकी उपस्थिति में कुछ असहजता महसूस हुई।
"तुम यहाँ क्या कर रही हो?" आयोजन समिति के एक सदस्य ने काव्या से सवाल किया।
"मैं इस इवेंट में भाग लेना चाहती हूँ," काव्या ने स्पष्टता से कहा।
"यह बहुत कठिन होगा, और यह सब लड़कों के लिए ज्यादा अच्छा है," उस सदस्य ने उपेक्षापूर्वक कहा।
काव्या ने थोड़ी देर उसकी आँखों में देखा, और फिर कहा, "अगर यह लड़कों के लिए है, तो मैं भी लड़कियों को साबित कर सकती हूँ कि हम भी यह कर सकती हैं।"
उस सदस्य ने थोड़ा चौंकते हुए काव्या को देखा और फिर उसे पंजीकरण करने की अनुमति दे दी। काव्या का आत्मविश्वास अब कहीं ज्यादा मजबूत हो गया था। यह छोटी सी जीत उसे यह समझने में मदद कर रही थी कि समाज की सोच को बदलने के लिए हमें खुद को हर कदम पर साबित करना होगा।
समाज की नज़रों में बदलाव
काव्या ने जितना भी वक्त विश्वविद्यालय में बिताया, वह जितना खुद को ढालने और मानसिक रूप से मजबूत करने की कोशिश करती, उतना ही समाज की रूढ़िवादी सोच का सामना करती। विश्वविद्यालय में छात्रों के बीच महिलाओं की भूमिका पर अक्सर चर्चा होती, और कई बार काव्या को यह महसूस होता कि वह हमेशा किसी न किसी प्रकार के पूर्वाग्रह का शिकार हो रही है।
एक दिन, काव्या और अमृता एक कॉफी शॉप में बैठी थीं। दोनों आपस में अपनी पढ़ाई और व्यक्तिगत जीवन के बारे में बात कर रही थीं। तभी, कुछ लड़के उनके पास आए और उनकी बातचीत में दखल देने लगे। एक लड़के ने हंसते हुए कहा, "क्या लड़कियाँ भी अब पढ़ाई कर सकती हैं? क्या यही समय है अपने सपनों को पूरा करने का?"
काव्या ने उस लड़के की तरफ देखा और फिर अमृता को देखा। अमृता ने उसकी आँखों में घबराहट देखी और काव्या से कहा, "तुम क्या सोच रही हो?"
काव्या ने मुस्कुराते हुए कहा, "मैं यह सोच रही हूँ कि यही समय है, और यही वह क्षण है जब हमें अपनी आवाज़ उठानी चाहिए।"
अमृता और काव्या दोनों ने एक साथ उन लड़कों के सवालों का जवाब दिया, और उन्होंने अपनी बातें सटीक और आत्मविश्वास के साथ रखीं। "हम किसी से कम नहीं हैं। अगर लड़के अपने सपनों को पूरा कर सकते हैं, तो हम क्यों नहीं?" काव्या ने कहा।
उन दोनों के शब्दों ने वहाँ बैठे लड़कों को चुप कर दिया, और यह काव्या के लिए एक और बड़ी जीत थी—न केवल शैक्षिक रूप से, बल्कि सामाजिक रूप से भी। वह जान चुकी थी कि समाज की सोच को बदलने के लिए हमें खुद को सही साबित करना होगा।
नई राहें और नया उद्देश्य
काव्या का अब लक्ष्य और स्पष्ट हो चुका था। वह केवल अपने सपनों के लिए नहीं, बल्कि उन लड़कियों के लिए भी संघर्ष कर रही थी जो अपनी आवाज़ नहीं उठा पातीं। उसे यह समझ में आ गया था कि उसका सफर सिर्फ उसकी निजी सफलता के लिए नहीं, बल्कि उन सभी लड़कियों के लिए है जो अपनी आवाज़ नहीं पा सकतीं।
शहर में रहकर काव्या ने बहुत कुछ सीखा था, लेकिन उसे अब यह महसूस हुआ कि उसका संघर्ष सिर्फ अपनी शिक्षा तक सीमित नहीं था। अब वह समाज के बड़े सवालों पर भी सोचने लगी थी। लड़कियों की शिक्षा, समाज में उनके स्थान, और उनके अधिकारों के बारे में सोचने का समय आ चुका था।
"मैं सिर्फ पढ़ाई नहीं, बल्कि एक बदलाव लाना चाहती हूँ," काव्या ने अपने आप से कहा।
और इस तरह, काव्या ने खुद से एक और वादा किया—वह न केवल अपने सपनों को पूरा करेगी, बल्कि समाज की सोच को बदलने के लिए भी काम करेगी। उसका यह नया उद्देश्य उसे और भी दृढ़ और मजबूत बना रहा था।
(जारी...)
आपको यह अच्छी लगी हो तो इसको रेटिंग जरूर दें