किताबें... किताबें... अकसर लोग किताबें पढ़ कर ये समझ लेते है की उन्होंने उस किताब के किरदार को जी लिया लेकिन... मेरे हिसाब से हम उसकी जिंदगी का वही हिस्सा महसूस कर सकते है जो लिखा हो या किताब में अधूरा हो। हम किताब के किरदार को कभी पूरा नहीं जी पाएंगे। क्योंकि उन बेजान किरदार में भी जान होती है, वह अपनी जिंदगी जी चुके। बस हम उसका थोड़ा हिस्सा ही जी पाए। ये मलाल हर किसी को महसूस न हुआ हो शायद!