जो बस मेरी हिस्से मेंथी
कविता
सुबह की नींद हल्की थी
सोना चाहती थी
पर ख्वाब जगी थी
बस जिज्ञासा था
सोचने की
और यही सोच मुझे सोने नहीं दी
फिर उठी आंख खोली
एक लंबी सी नींद से राहत पाई
उगते सूरज के साथ
बढ़ती हुई उम्र थी
और उठती हुई जिज्ञासा
खुद के लिए फिर तिखी चाय बनाई
और फिर एनर्जी को
खुद के अंदर भरने के लिए
कोई गीता सुना
जो मन को भाया
मैं ने फिर खुद के लिए कुछ तीखा बनाया
अपने हाथों की बनाई हुई
तीखे खाना को खाकर
मुझे थोड़ा और जीने की चाहत हुई
और फिर एक्साइटमेंट हुई
कि मैं कहीं जाऊं
ऐसा लगा कि हवाओं से बात करू
हवाओं के साथ बहे जाने के लिए
एक ठंडी शगुन थी आंखों में
हां मैं कहीं घूमने गई थी
कड़ी धूप थी
और भीड़ भाड़ वाली जगह
फिर भी मैं हर चीज महसूस कर पा रही थी
मैं ने खुद के लिए कुछ खरीदा
और वह मेरी खुशी थी
और फिर घर वापस आई
हवाओं से फिर बात करते हुए
अपने होने की एहसास खुद को दिलाते हुए
और फिर मैं आज अपनी सहेली से मिली
बहुत देर तक मैंने उससे बात की
जो दिल में था
जो राज थी वह भी खोला
जी चाहे जो बोला
और फिर शाम हुई
चांदनी मेरे हाथों पर थी
और लग रही थी
चांद को मैं हाथों में लेकर बैठू
फिर धीरे-धीरे मैंने चांद से
पास अपना हाथों को हटा ली
यह कहकर की
किसी को मुझे कैद करना पसंद नहीं
नहीं ऐ अच्छी बातें हैं
और जितनी चांदनी रात खूबसूरत है
इतनी खूबसूरत मुझे मेरी आजादी है
और ये आजादी मेरी चांदनी रात है
मैंने आज फिर एक दिन
दिल को शगुन पहुंचने के लिए जिया
वह आजादी महसूस कीई
जो बस मेरी हिस्से में थी
हां यह आजादी मेरे लिए काफी नहीं थी
पर कुछ ऐसी थी
जेसे घायल परी नन्ही सी
परिंदा के निकलती हुई
पहली पड़
यह कविता आप सबको पसंद आए तो
आगे पढ़ते रहिए
मैं आपकी प्रिय लेखक अभिनिशा❤️🦋💯