|| प्रेम का सामर्थ्य ||
बंध जाते हैं सिंधु सेतुओं से,
पत्थर पानी में भी तिर जाते हैं।
हो यदि सामर्थ्य प्रेम में,
तो बंदर भी सेतु बनाते हैं।
विष फिर विवश हो जाता है।
ज्यों गरल मीरा के समुख आता है।
यदि हो सामर्थ्य प्रेम में,
शक्तिहीन हो सुधा बन जाता है।
न रुकता अंतक, मृत्यु अटल है।
फिर न जीवन है, न कल है।
हो यदि सामर्थ्य प्रेम में
यम के समुख खड़ा हो जाता है।
मृत्यु से भी बड़ा हो जाता है