भट्टसाहेब
चले जा रहें है....
उसे देखने हम चले जा रहे है,
उसीकी तरफ हम ढले जा रहे है।
सुरत तो नजर भी नही आती उसकी,
कहीं ना कहीं वो मिले जा रहे है।
कहा से न जाने हसीन लोग आए,
मुझे पांव से वो तले जा रहे है।
उसे चेहरे तो हजारों मिले पर,
उसीकी तरफ क्यूं खिले जा रहे है।
मना भी किया चाहने से तु ने तो,
ये "साहेब" हम तो जले जा रहे है।