मैं से तुम
___________________
लिखने के क्रम में
जब-जब
उच्चारा है तुम्हारा नाम / देखा है तुम्हें
वैसे
जैसे देखती हैं
प्रेम से लबालब आँखें।
तो,
मेरे होठों की त्रिज्या में
खिल आए हैं
गुलदाऊदी के फूल।
फूल जिनके पंखुड़ियों पर
ठहर गया —
मेरा पूरा “मैं”
ठहर गया सारा दर्शन,
ठहर गया है कवि-मन भी।
और इस तरह
तुम्हें लिखते-लिखते
मैं उतर आया हूँ
नम्रता में,
प्रेम में,
विश्वास में,
और मनुष्य होने के हिस्से में।
इसलिए प्रिय,
यदि कभी मेरे होठों से
कोई फूल झरे,
तो समझना —
मैं “तुम” हो चुका हूँ।
और
“मैं” से “तुम” हो जाना
प्रेम की
सबसे परिपक्व,
सबसे सुंदरतम
घटना है।
@ कुणाल कुमार