छूट गया क्या, वो मेरा घर ,
अब रहती हूँ जिसमे,या वो मेरा घर,
बचपन बिताया जिसमें,
साथ निभाया जिसने,
फुदकी, चहकी,उछली
उड़ी मैं बिन पर,
क्या नहीं था वो मेरा घर,
कसमें निभा रहीं हूँ यहां,
मकान से घर बना रहीं हूँ यहां,
स्त्री तो है खुशकिस्मत ,
दो छत होती हैं,
बस केवल समझ का फर्क,
ये भी घर वो भी घर।।
सब खुश तो रहूँ मैं भी खुश,
हंसे सब तो हंस देती हूँ,
कसक नहीं मायका छूटने की,
नहीं बेचैनी पुरानी मैत्री टूटने की,
नित नए सम्बन्ध जुड़ रहे यहां,
रोज़ बन रहे नए जहां,
मैं तो एक परिवार की नींव हूँ,
मुझ पर आधारित सब के पर,
ये भी घर,वो भी घर।।
धन्यवाद(शिल्पी गुप्ता)
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