सोने के पिंजरे में बंद थी जिसकी तकदीर,
उसने चांदी की ज़ंजीरों से खींच दी एक लकीर।एक तरफ था संगमरमर का वो ऊँचा मकान,
दूसरी तरफ था टूटी छत का अदना सा इंसान।मोहब्बत की भाषा दोनों की एक जैसी ही तो थी,
पर एक की जेब खाली थी, एक की तिजोरी भरी थी।
गरीब की आँखों में जो वफ़ा का साफ़ समंदर था,
अमीर के लिए वो बस एक अदना सा बवंडर था।दौलत के घमंड में उन्होंने हर रस्म को मोड़ दिया,
पैसों की खनक से वफ़ा के शीशे को तोड़ दिया।बोली लगी जज्बातों की भरे बाज़ार के बीच,
गरीब का सच्चा प्यार कुचल दिया अहंकार के बीच।
गाड़ियों के पहियों ने कुचल दीं वो ख़ामोश राहें,
जहाँ कभी खुली थीं मिलने को दो मासूम बाहें।
एक तरफ मजबूरी की आँसू में डूबी रात थी,
दूसरी तरफ शहनाइयों संग जश्न की बारात थी।
वो समझ न सके कि प्यार खरीदा नहीं जाता,
दिलों का सौदा बाज़ारों में किया नहीं जाता।
महल जीत गया, झोपड़ी हार गई इस जंग में,
पर आज भी वो प्यार ज़िंदा है हवा के हर रंग में।