बचपन था मासूम हवा सा, किलकारी और खेल था,
कागज़ की कश्ती पानी में, खुशियों का ही मेल था।
आई जवानी तो सपनों का, एक नया तूफ़ान उठा,
ज़िम्मेदारी और चाहत में, हर लम्हा हैरान उठा।
ढलती उम्र बुढ़ापा लाई, यादों का भंडार मिला,
धड़कन शांत हुई जीवन की, अपनों का आभार मिला।
गुज़र गए सब मौसम यूँ ही, जीवन की इस राहों में,
तीनों रंग समेटे हँसकर, सो गए रब की बाहों में।