तुम औरत हो
फिर क्यों
एक औरत की आवाज़ को
शोर में दबा रही हो?
जिसने तुम्हारी तरह ही
स्वप्नों को सीने में दबाया है,
जिसने तुम्हारी तरह ही
रातों से समझौते किए हैं।
तुम जानती हो ना...
औरत का दर्द
सिर्फ़ आँसू नहीं होता,
कभी झिकझिक होती है,
कभी चुप्पी,
तो कभी ज़िंदा लाश-सी मुस्कान।
फिर क्यों
उसकी उड़ान से जलती हो?
क्यों उसकी हार पर
तसल्ली से मुस्कुराती हो?
अगर औरत ही
औरत का हाथ छोड़ दे,
तो ये दुनिया
उसे जीने का हक़ कब देगी?
सोचो,
जब एक औरत दूसरी औरत के खिलाफ़ खड़ी होती है,
तो सिर्फ़ एक इंसान नहीं टूटता,
पूरी पीढ़ियाँ बिखर जाती हैं।
सोचो...
तुम औरत हो,
फिर भी औरतों के नस्ल को दर्द में दफ़ना रही हो।
- श्री कृति