सुनो सुनाती मैं तुमको मैत्री की एक ऐसी कहानी।
जो सबने सुनी और पहचानी।
जब शिशुपाल वध के समय कान्हा की उंगली से था सुदर्शन चला।
तब माधव की उंगली से रक्त था बहा।
पर गोविंद अपनी पीड़ा थे छिपाए ।
ऐसे जैसे कोई वो पीड़ा देख ही ना पाए।
एकाएक सखी पांचाली की पड़ी माधव के हाथ पर दृष्टि।
उसने फाड़ा अपना आँचल बाँध दिया घाव पर ऐसे जैसे समेट ली स्नेह की सृष्टि।
उसने बाँधा वो स्नेह का बंधन उसे क्या भान था माधव ऐसे चुकाएंगे वो कर्ज़।
किया जब दुशासन ने चीरहरण ना पति ना ही बढ़े कोई भी ना था संग ,
तब माधव ने बढ़ाया चीर निभाया मित्रता का फर्ज़।
माधव कहे एक सूत के बदले सब दे दूँ मेरी सखी हो तुम ।
माधव की सखी बनकर भी पाया दुनिया से गम।
दुनिया है दुख तो देगी हमें माधव मिले यही है सुकून।
माधव हैं मेरे भी सखा मुझे लगी सांवरे की धुन।
— _सृष्टि तिवारी शान_
- srishti tiwari