रामायण और गीता जैसी, माता, सहज सुनीता जैसी ।
जीवन दात्री निर्झरिणी सी, पावन और पुनीता जैसी ।।
कर्तव्यों की गाथा जैसी, भू पर भाग्य विधाता जैसी ।
वात्सल्य के पुष्पगुच्छ सी, भाव भरी संगीता जैसी ।।
सम्बन्धों में आला जैसी, सत की सुन्दर माला जैसी ।
कोमलमन निर्मलमन वाली, सरिता तीर शिवाला जैसी ।।
वाणी से शीतल जल जैसी, जीवन में अमृतफल जैसी ।
हर दिन आती नेह लुटाती, वह शीतल गंगाजल जैसी ।।
माँ बिल्कुल साधारण जैसी, संकट बीच निवारण जैसी ।
पल भर में पीड़ा हर लेती, मंत्रों के उच्चारण जैसी ।।
@सर्वाधिकार सुरक्षित-डाॅ.विजय प्रताप शाही