ख़ामोशियाँ" 🖤#Miss Neha Banchhor
तुम्हारे दर्द से मुझे कोई शिकायत नहीं,
शिकायत तो बस इतनी सी है...
कि तुमने उस दर्द के दौर में,
मुझे कभी अपना समझा ही नहीं।
मैं दरवाज़े पर दस्तक देती रही,
और तुम हर बार कहते रहे— "बाद में..."
और मैं उसी "बाद में" के साए में,
हर रात चुपचाप बिखरती रही।
तुम कहते रहे— "मैं ठीक हो जाऊँगा..."
और मैं बस यही सोचती रही—
क्या सच में साथ होने का मतलब,
सिर्फ़ खुशियाँ बाँटना होता है?
मैं तुम्हारे ज़ख्म माँग नहीं रही थी,
बस उनमें अपनी थोड़ी-सी जगह चाहती थी...
आज मैं भी ख़ामोश हूँ,
किसी गुस्से से नहीं...
उस इंतज़ार से थककर,
जहाँ हर धड़कन बस यही पूछती रही—
"जिसे अपना कहा था...
क्या उसके हिस्से का दर्द भी इतना पराया होता है?".