. “कर्म”
मैं बहुत आलसी हूं
नहीं पसंद ज्यादा मेहनत करना,
मैं एक आम–सा लड़का हूं
कम है बस आराम फरमाना।
कभी कभी ऐसा लगता है कि—
मैं एक बादल बन जाऊं,
हवा मुझे जहां ले जाए
बिना मेहनत के वही चला जाऊं।
कभी कभी मन होता है कि—
मैं एक पेड़ बन जाऊं,
बिना मेहनत के जीवन भर
बस एक जगह खड़ा रह जाऊं।
हर कोई मेहनत से भागता है
मगर मेहनत तो सबको करना पड़ता ही हैं।
वो आलसी बादल भी कभी
बारिश बन कर बरस जाता,
कभी बर्फ तो कभी भाप बन कर
अपना सफर जारी रखता।
वो आलसी पेड़ भी कभी
बिना पोषण के सूख जाता,
बारिश, तूफान और धूप से लड़ते हुए
जीने के हेतु हर रोज संघर्ष करता।
पेड़ हो या इंसान
सभी अपने कर्म से बंधा है,
जीवन जीने के लिए सबको
संघर्ष ही करना पड़ता है।