"ग़मे-आवारी"
बहते अश्क़ों की रवानी का आलम न पूछो,
ये क़तरे समंदर से भी ज़्यादा ख़ारी है।
ग़म की बस्तियाँ तामीर करती हूँ हर रोज़,
मेरी सुनसान राहों का तन्हा सफ़र अभी ज़ारी है।
दिल के वीराने में गूँजती हैं सिसकियाँ,
ज़िंदगी मेरी अब भी सख़्त दुश्वारी है।
झूठ, फ़रेब, चालाकियाँ तेरी फ़ितरत में निकलीं,
वरना मेरी रग-रग में तो अब भी वफ़ादारी है।
तेरी यादों का आलम भी अजीब सा है,
कभी राहत तो कभी दिल पे ग़मे-आवारी है।
रात ढलती है "कीर्ति" मगर नींद नहीं आती अब,
इन निगाहों पे तेरी सूरत की हुकूमत जारी है।
Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️
तामीर = निर्माण, बनाना
सख़्त दुश्वारी = बेहद कठिन
ग़मे-आवारी = उजड़ने या बर्बाद हो जाने का ग़म