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🌺 "छिन्नमस्तिका – आत्मा की पुकार" 🌺
कटे हुए सिर की मुस्कान में, छिपा है ज्ञान महान,
न कोई भय, न मोह शेष, बस शून्य का वरदान।
अपने ही हाथों से, सिर जब देवी काटती हैं,
तो अहंकार, वासना, सब सीमाएँ लांघ जाती हैं।
तीन धाराएं रक्त की, जीवन-स्रोत बन जाएं,
सेविकाओं को पोषण दें, आत्मा को राह दिखाएं।
नग्नता में नहीं लज्जा, वह सत्य की पहचान है,
जहाँ आत्मा स्वतंत्र हो, वही असली ज्ञान है।
रति–कामदेव के ऊपर खड़ी, शक्ति की वह मूरत है,
वासना पर विजयी नारी, साधना की सूरत है।
कटे हुए मस्तक की वाणी, चुप रहकर भी बोलती है,
"तू जब खुद को खो देगा, तभी मुक्ति मिलती है।"
छिन्नमस्तिका न हिंसा हैं, न केवल तांत्रिक कथा,
वो हैं आत्म-ज्ञान की देवी, जो दिखाएं सच्ची दिशा।