दोहे
धूप
तीव्र धूप की तीव्रता,करती तीव्र प्रहार।
घायल करे शरीर को,पड़े धूप की मार।।
प्यारे गोल कपोल है,मिला यही आकार ।
देख- देख मन झूमता,हमें हुआ है प्यार।।
आखेट
पिया गए आखेट पर, बढ़ी आज फिर पीर।
होगा घायल कौन अब,किसे लगेगा तीर।।
प्रतिदान
करना लालच तुम नहीं,करो हमेशा दान।
तेरे अच्छे कर्म का,मिलता है प्रतिदान।।
निकुंज
भाव भरे निकुंज में, प्रिये तुम्हारा वास।
पल पल ये रस घोलता,बस तेरी है आस।।
डॉ भावना शुक्ल 🙏