ये राहें, ये मंजिले , उस पल की गवाही है
जहां जीवन ने खुद को खुद की पहेचान कराई है
यूं बढ़ते तूफान में इंसान ना जाने
कोन सी मंजिल का राही है ,
टूटे कांच की तरह बिखर कर भी
फिर जुड़ने की आश मेने पाई है।
दर दर भटकते हुए मेने , हर ठोकर खाए हैं
ये जमाना क्या ही जानें,
मेने मुश्कुराहटो के पीछे आंसू ओ की
कितनी नदियां छिपाई है।
आसमां को पाने के लिए , हर रोज
मेने जमीं की चोट अपनाई है ,
रुख तो बदलना ही था एक दिन
आखिर मैने एक दिन के लिए बोहोत सी राते गवाई है ।
- HEER