यादें उस पल की जब हम छुप छुप के मिलते थे
हम कसमें खाते थे और कुछ वादे करते थे।
शरमाई आँखों में चमकीली उम्मीदें
माथे पे अलसाई पसीने की बूँदें,
करवट बदल बदल के भी जब ना आती थीं नींदें
तब फोन लगा के कर लेते थे चुपके से कुछ बातें,
यादें उस पल की जब हम छुप छुप के मिलते थे।
कपकपाते होठों पे शब्दों की लाचारी
आधी अधूरी मुलाकातें भी लगती थीं प्यारी,
जब तक ना होती थीं तेरी मेरी मुलाकातें
घुम घुम के छत के ऊपर कट जाती थीं सारी रातें,
यादें उस पल की जब हम छुप छुप के मिलते थे।
उबड़ खाबड़ रस्ते पे सायकल की सवारी
बीच सड़क पे कर लेते थे हम जब मारा मारी,
लोग खड़े हो जाते थे तेरे हक में वहाँ आके
तब तुम चूम लेती थी मेरे हाथों को सहला के,
यादें उस पल की जब हम छुप छुप के मिलते थे।
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