🌍 जमाने में कहां जाकर रुकेगा यह इंसान...?
कहां गया वह आसमान
कहां गई वह जमीन
कहां चला गया उन मासूम बच्चों का बचपन...
यह जिंदगी कहां आकर रुक गई...?
वह पहले वाली तेहवारों की किलकारियां कहां गुम हो गई...
पता नहीं यह जमाना कहां आकर रुक गया...
अपनों से नाता तोड़ कर कहीं और झूड गया है...
पता नहीं यह इंसान कहां जा रहा है...?
अपनी मंजिल को तरछोड़कर यूं ही बर्बादी को लिख रहा है...
पता नहीं क्यूं यह इंसान खुद को भुलाकर दर्द से वास्ता जोड़ रहा है...
मेहनत को छोड़कर न जाने क्यूं मशीनो को ढूंढ रहा है...
पता नहीं यह इंसान प्यार की प्यास में खुद को जला कर क्या पाना चाहता है...
इन खूबसूरत नजारों को बिखेर कर क्यू खुद को सवारना चाहता है...
पता नहीं यह इंसान लालच में और कितना खुद से गिरता जाएगा...
पता नहीं यह इंसान कहां जाकर रुकेगा...?
जमाने को पाने की चाहत में खुद को कब्र की ओर ले जा रहा है...
पता नहीं क्यूं खुद को मिटा कर खुद को सवारने में लगा है यह इंसान...
- स्नेह सुंदरी...🥀