ए आईना अक्सर तूँ सच क्यूँ कहता है
ज़रा सी मेरी परवाह, क्यूँ नहीं करता है
ज़माने भर के ग़म को समेटे आती हूँ मैं
मेरे एहसासों से तूँ बेपरवाह क्यूँ रहता है
ए आईना अक्सर तूँ, सच क्यूँ कहता है
एक तूँ ही तो है मेरे खुशी का बस सहारा
मेरे इरादों को नेस्तनाबूद तूँ क्यूँ करता है
हज़ारों बातें सोचती हूँ, कह डालूँ तुझसे
मेरे जज़्बातों की फिक्र क्यूँ नहीं करता है
ए आईना अक्सर तूँ सच क्यूँ कहता है
टूटकर बिखर जाऊँ मैं भी इस जिंदगी में
मेरे जज़्बातों की कदर क्यूँ नहीं करता है
एक तेरा ही सहारा हैं निराला जिंदगी में
मुझे समेटने को आगे, क्यूँ नहीं बढ़ता है
ए आईना अक्सर तूँ सच क्यूँ कहता है