*🚩जय श्री सीताराम जी की* 🚩
*आप सभी श्री सीतारामजीके भक्तों को प्रणाम करता हूँ*
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*श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड*
*श्री नाम वंदना और नाम महिमा*
चौपाई :
*बंदउँ नाम राम रघुबर को।*
*हेतु कृसानु भानु हिमकर को॥*
*बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो।*
*अगुन अनूपम गुन निधान सो॥1॥*
भावार्थ:-
मैं श्री रघुनाथजी के नाम 'राम' की वंदना करता हूँ, जो कृशानु (अग्नि), भानु (सूर्य) और हिमकर (चन्द्रमा) का हेतु अर्थात् 'र' 'आ' और 'म' रूप से बीज है। वह 'राम' नाम ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप है। वह वेदों का प्राण है, निर्गुण, उपमारहित और गुणों का भंडार है॥1॥
*महामंत्र जोइ जपत महेसू।*
*कासीं मुकुति हेतु उपदेसू॥*
*महिमा जासु जान गनराऊ।*
*प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ॥2॥*
भावार्थ:-
जो महामंत्र है, जिसे महेश्वर श्री शिवजी जपते हैं और उनके द्वारा जिसका उपदेश काशी में मुक्ति का कारण है तथा जिसकी महिमा को गणेशजी जानते हैं, जो इस 'राम' नाम के प्रभाव से ही सबसे पहले पूजे जाते हैं॥2॥
*जान आदिकबि नाम प्रतापू।*
*भयउ सुद्ध करि उलटा जापू*॥
*सहस नाम सम सुनि सिव बानी।*
*जपि जेईं पिय संग भवानी॥3॥*
भावार्थ:-
आदिकवि श्री वाल्मीकिजी रामनाम के प्रताप को जानते हैं, जो उल्टा नाम ('मरा', 'मरा') जपकर पवित्र हो गए। श्री शिवजी के इस वचन को सुनकर कि एक राम-नाम सहस्र नाम के समान है, पार्वतीजी सदा अपने पति (श्री शिवजी) के साथ राम-नाम का जप करती रहती हैं॥3॥
*हरषे हेतु हेरि हर ही को।*
*किय भूषन तिय भूषन ती को॥*
*नाम प्रभाउ जान सिव नीको।*
*कालकूट फलु दीन्ह अमी को॥4॥*
भावार्थ:-
नाम के प्रति पार्वतीजी के हृदय की ऐसी प्रीति देखकर श्री शिवजी हर्षित हो गए और उन्होंने स्त्रियों में भूषण रूप (पतिव्रताओं में शिरोमणि) पार्वतीजी को अपना भूषण बना लिया। (अर्थात् उन्हें अपने अंग में धारण करके अर्धांगिनी बना लिया)। नाम के प्रभाव को श्री शिवजी भलीभाँति जानते हैं, जिस (प्रभाव) के कारण कालकूट जहर ने उनको अमृत का फल दिया॥4॥
दोहा :
*बरषा रितु रघुपति भगति*
*तुलसी सालि सुदास*
*राम नाम बर बरन जुग*
*सावन भादव मास॥19॥*
भावार्थ:-
श्री रघुनाथजी की भक्ति वर्षा ऋतु है, तुलसीदासजी कहते हैं कि उत्तम सेवकगण धान हैं और 'राम' नाम के दो सुंदर अक्षर सावन-भादो के महीने हैं॥19॥
चौपाई :
*आखर मधुर मनोहर दोऊ।*
*बरन बिलोचन जन जिय जोऊ॥*
*सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू*।
*लोक लाहु परलोक निबाहू।।*
भावार्थ:-
दोनों अक्षर मधुर और मनोहर हैं, जो वर्णमाला रूपी शरीर के नेत्र हैं, भक्तों के जीवन हैं तथा स्मरण करने में सबके लिए सुलभ और सुख देने वाले हैं और जो इस लोक में लाभ और परलोक में निर्वाह करते हैं (अर्थात् भगवान के दिव्य धाम में दिव्य देह से सदा भगवत्सेवा में नियुक्त रखते हैं।)॥1॥