पुस्तक लेखक की मानस संतान है। वह उसकी मेधा और परिश्रम का फल है। इसलिए किसी को इस विषय में संशय नहीं होना चाहिए कि पुस्तक लेखक की होती है। वह उस पाठक की भी होती है जिसे पुस्तक का इंतजार होता है और एक कोने में बैठकर उसे पढ़ता है। हालॉंकि शायद ऐसा एकांतप्रिय पाठक दुर्लभ हो चला है जो निश्चल मन से किताब को पढ़कर उसके पात्रों की जगह खुद को रखने लगता है। पुस्तक प्रकाशक, विमर्शो के पुरोहितों तथा काजियों की हरगिज नहीं हो सकती है। लेखक की एक ही चाह होती है कि उसकी पुस्तक उस अनाम और अज्ञात पाठक के पास पहुँचे जिसने पढ़ने के शौक को अब तक सहेज कर रखा है। एक पत्रिका में कहानी प्रकाशित हो जाने अथवा एक प्रकाशक के द्वारा उपन्यास प्रकाशित हो जाने का अर्थ यह कदापि नहीं है कि उसे दूसरी जगह प्रकाशित करना गैरकानूनी या अनैतिक है। आखिर प्रकाशित रचना साहित्य जगत के कितने पाठकों के पास पहुँची है? प्रकाशक ने रॉयल्टी या मानदेय और पारिश्रमिक के रूप में कितनी राशि लेखक को उपलब्ध करायी है जिसकी वजह से किताब सदैव के लिए प्रकाशक की हो गयी? कई बरसों बाद भी पुस्तक पुर्नप्रकाशन की अधिकारी नहीं है। जो प्रकाशक प्रूफ रीडिंग का काम भी लेखक से ही करवाते हैं और इसके बाद भी वर्तनी की असंख्य गलतियों को ज्यों का त्यों छाप देते हैं वे उस छलनी की तरह हैं जो स्वयं के छिद्रों से अनजान बनती है। कुछ प्रकाशक किताब की बाईडिंग में भी पन्नों को आगे-पीछे करके अपनी प्रज्ञा और ज्ञान का परिचय देने से नहीं चूकते हैं। जिसने लेखक ने कोई अनुबंध नहीं किया और न ही कभी यह सूचना दी कि पुस्तक की कितनी प्रतियॉं बिकी हैं, उसे यह कहने का कोई नैतिक और कानूनी अधिकार नहीं है कि पुस्तक या रचना का पुर्नप्रकाशन क्यों करवाया। पारदर्शिता, ईमानदारी और शिष्टाचार से कई प्रकाश वर्ष दूर रहने वाले संपादक और प्रकाशक लेखक को नैतिकता और आदर्श न सिखाए।
पुस्तक कोई रहस्यमय मंत्र गढ़ने अथवा अकादमिक सरदर्द उत्पन्न करने के लिए नहीं लिखा गया है। यह पाठक तक अपनी संवेदना और विचारतत्व को पहुँचाने का माध्यम है। प्रकाशक के लिए पुस्तक प्रकाशन महज एक कारोबार है लेकिन कारोबार में पारदर्शिता आवश्यक है। अगर पाठक तक सीधे पहुँचाना सुलभ होता तो प्रकाशक जैसे जीव को माध्यम बनाने की जरूरत नहीं होती।