तुम देखने आये थे शायद !
हाल मेरा , या फर्ज सा ?
या फिर जिम्मेदारी के कण भर आभाष खींच,
लाया तुम्हे जिसे कुछ देर के लिए ? क्या सच मे तुम,
उपस्थित थे यहाँ ???
हाँ ! विचलित नही हूँ मैं कुछ शान्त सी नही मालूम क्यों,
यह तुम्हारा मुझे बिसराना है या अन्दर बैठ जाना |
मुझमे मेरा है ही कहाँ ? हूँ ! जो दर्पण तुम्हारा ||