मुझे मेरी ही कमी खलती है .........
क्योंकि जिम्मदारियों के भँवर में कहीं खो - सी गई हूँ,
अपनों को सँवारते - सँवारते खुद बिखर - सी गई हूँ ।
चमकती धूप में जब कभी देखती हूँ अपनी हथेली को,
कम नहीं पाया कभी मैंने अपने हाथों की लकीरों को ।
मुझे एक ख्वाहिश थी सबके दिलों पर हुकूमत चलाने की ,
चिड़िया की - सी इठलाती हुई घर-आँगन को चहकाने की ।
वो चहकना कहीं छूट गया अब मैं खुद से रूबरू होना चाहती हूँ ,
मुझे मेरी ही कमी खलती है अब मैं खुद से मिलना चाहती हूँ ।