शिर्षक: अंतिम-पश्चाताप
मौत आती नहीं, साँसे रुकती नहीं
तूफानों की जिंदगी में, कोई कमी नहीं
ख्याल था, दिन कभी बदल जायेंगे
बिखरे कष्टों के बादल, बिखर जायेंगे
आसमान की तरफ देखा, जीवन बिंदु दिखा
टिमटिमाते तारे जैसी थी, उसकी क्षीण रेखा
मुश्किल से मिला जीवन, हाथ से फिसल गया
ये देख परेशां जिंदगी का, हाल-बेहाल हो गया
सच जब सुरमई हो, बाहर की तरफ झाँकता
अंदर का रावण, भीतर- बाहर दोनों से काँपता
राम के अंदेशे में, इँसान से कितना गलत हो जाता
अपनी सीमाओं की मर्यादा तक ही, वो भूल जाता
कल सूरज उगेगा या नहीं, अब नहीं कह सकता
हाँ, एक आशा का स्वर्ण-फूल, अब भी बहलाता
बचे क्षणों की कहानी है, दोस्तों तुम्हें ही अब सुनाता
रिश्तों के सँसार में, अब धैर्य को इसी तरह अजमाता
जीवन का अंतिम सच, आज मेरे सामने मुस्करा रहा
हर बिता पल, अफसोस के काँटो का नश्तर चुभा रहा
इसे पश्चाताप ही समझना, जीवन तो अब बहाना है
कभी बुलंद था, अब ये किस्सा लगता बहुत पुराना है
✍️कमल भंसाली