फ़लसफ़ा जीने का👈
किस मकसद को अपना कहते
हर मकसद में तो गैर सपने रहते
नीलामी के दरवाजे पर, भाग्य को तलाशते
अंधकार इतना गहरा , स्वयं को नहीं पहचानते
सुई की नोक पर टिकी, अब उम्र की अवधि
तमाशे की तरह व्यवहार करती, अब हर व्याधि
दहलीज उसी पर खड़े, जहाँ से सफर शुरु किया
गुजर गया समय, हासिल तो कुछ भी नहीं किया
जिस सोच के साथ आये, वो अब बगले झाँकती
कल तक नाचने वाली जिंदगी, अब भयभीत रहती
फ़लसफ़ा सही जीने का, जी कर भी न समझ पाये
संतोष ही देते स्वयं को कहकर, दस्तूर सब ही निभाये
✍️ कमल भंसाली
-Kamal Bhansali