जहाँ जाना है! चला जा ! !
नही रोकूँगी तुझे मगर मै कहाँ जाऊँगी यह पूँछने का अधिकार तुझसे छीनती हूँ |
-Ruchi Dixit
जानती हूँ , तू अपने मन का है , जो लगे ठीक तुझे बस वही करता है , हूँ तेरे हाथ की कठपुतली ही तो, भावनाए भर भावों से खेलता है नही पता कष्ट देता है तू या आप ही झेलता है ...