**ख्वाब कल के लेकर**
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( मुक्तछंद काव्य रचना )
मायुसी छाई है कैसी हर निगाहों में,
जिंदगियां जल रही है यहां श्मशानों में।
ये कैसा दौर चल रहा है आज यहां,
सारा संसार डुबा है कैसे आंसुओं में।
कहीं पर तैरती है ये लाशें पानी में,
कहीं पर उठता धुंआ है आसमां में।
सुनी सुनी सी लग रही है गलियां ,
और मौत का तांडव है दिशा दिशाओं में।
सभी रिश्तों में आ गई है दुरियां,
अपना भी यहां भाग रहा है अपनों से।
हंसी खुशी की वो जिंदगी आज यहां,
अश्क बहा रही है अपनी निगाहों से।
हाथों को मिलता अब कोई रोजगार नहीं,
कई भूखे पेट है यहां रोटी के इंतजार में।
आज के पहले कभी नहीं देखा ऐॆसा मंज़र,
रास्तें खुले हैं और इन्सान बंद है दिवारों में।
आज भी वक्त यहां वैसे ही चल रहा है,
लेकिन जिंदगियां सारी थम सी गई है।
मानों उजड़ा हुआ सा दिखता है ये सारा चमन,
जहां फूल खिले थे कल खुशियों के रंगों में।
मायुसी छाई है कैसी हर निगाहों में,
जिंदगियां जल रही है यहां श्मशानों में।
खुशी के लिए तड़प रही है ये जिंदगियां,
ख्वाब कल के लेकर अपनी निगाहों में।
मिलिंद क.महा.लातूर.
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