शीर्षक : पथ का सिपाही
मुक्त हो जाऊंगा जिस दिन शरीर दर्शना से
एक प्रेम गीत लहरों को अर्पित कर जाऊंगा
न लौटूंगा फिर कभी किसी जीवेश चेतना से
जन्म के गिले शिकवो का अंत कर जाऊंगा
याद न करना मेरे किसी गलत अस्तित्व को
न कभी, महसूस करना गलत भावनाओं को
हर रिश्ते के बंधन से अबआजाद हो जाऊंगा
पथ का सिपाही हूँ, कभी लौट कर न आऊंगा
कभी रहा था तुम्हारी आंखों में, तस्वीर बन के
धुंधला देना हर रंग की धुंधली हुई चित्रकारी को
स्याह हुई हर द्रष्टव्य स्मृति को ही मिटा जाऊंगा
जमी हो कोई धूल, किसी स्मृति के दर्पण पर
अपने आंसू की एक निःशेष बूंद मुझे दान देना
पड़ी कालिमा, तुम्हारे दिल पर साफ कर जाऊंगा
विषाद के अवशेषों का हर क्षण, शेषांस कर जाऊंगा
जीवन की हर नकारत्मकता को, सत्यता से नहाऊंगा
तयः सत्य के अस्तित्व में स्वयं को विलीन कर जाऊंगा
अंत नहीं होगा मेरा सिर्फ अंतर्मन जुदा होगा
कर्म की चौपाल में न्याय का दीप जलाऊंगा
चेतना मय मुक्ति की ईश से गुहार लगाऊंगा
रचियता✍️ कमल भंसाली