मोह
शहर के एक प्रसिद्ध व्यापारी श्री पोपटमल जी को कुत्तों को पालने का बहुत शौक था मानो वे उन्हें अपने से भी ज्यादा प्यार करते थे। एक दिन वे प्रातः काल भ्रमण के साथ साथ अपने कुत्तों को घुमा रहे थे तभी उन्होंने देखा कि एक साधु जो कि रामदास जी के नाम से प्रसिद्ध थे वे भी प्रातः भ्रमण का आनंद रहे थे। उनके पास आने पर पोपटमल जी ने उनका अभिवादन किया और उनके साथ साथ वार्तालाप करते हुए चलने लगे। उनसे धार्मिक विषयों पर चर्चा करते हुए पोपटमल ने स्वामी जी से कहा कि मैं मोक्ष चाहता हूँ और इस हेतु मैं क्या करूँ ?
स्वामी जी ने मुस्कुरा कर कहा यह कठिन विषय है और तुम पहली सीढी को छोडकर सीधे अंतिम सीढी पर पहुँचना चाहते हो। वह व्यापारी बोला आप मुझे उपाय तो बताए। उसकी हठधर्मिता देखकर स्वामी जी ने मुस्कुराते हुए कहा कि मोक्ष प्राप्त करने के लिए ईश्वर से सच्चे मन से प्रार्थना करो। व्यापारी ने स्वामी जी से पूछा कि मैं ऐसा क्या करूँ की ईश्वर प्रसन्न हो जाए? स्वामी जी हंसते हुए कहा कि तुम जितनी सेवा, प्यार स्नेह व समर्पण अपने कुत्तों के प्रति रखते हो वैसा ही भाव तुम प्रभु के प्रति रखकर समर्पित हो तो प्रभु की कृपा स्वमेव हो जाएगी और तुम्हें मोक्ष का रास्ता दिख जाएगा।
मुझसे कल मिलना और बताना कि इस दिशा में तुमने क्या किया। दूसरे दिन पुनः प्रातः काल स्वामी जी से मिलने पर वह व्यापारी कहने लगा कि स्वामी जी आपने बहुत कठिन कार्य बता दिया है। मैंने अपने इन कुत्तों को बचपन से पाला है और मैं इन्हें भूल नही पाता। मेरा इनके अलावा किसी चीज में प्रयास करने पर भी मन नही लगता है। मैने मोक्ष की कल्पना यह देखकर छोड दी है। मुझे सांसारिक जीवन ही अब जीना है। स्वर्ग की अनुभूति मेरे दिल दिमाग से उतर गयी है। यह तो आप जैसे साधु संतो के लिए ही संभव हो सकता है। मुझे क्षमा करे मैने आपका समय इस चीज के चिंतन हेतु व्यर्थ ही नष्ट किया। स्वामी जी यह कहकर कि देर आयद दुरूस्त आयद अपने मार्ग पर आगे बढ गए।