चल रे कथा यहीं पर रूक
यहाँ नहीं तो आगे रूक,
घराट पर रूक, नौलों पर रूक
नदियों के आँसुओं पर रूक।
बादलों के नीचे रूक
हँसते ,मुस्कुराते होंठों पर रूक,
प्यार के स्थलों पर रूक
त्यौहारों के पकवानों पर रूक।
चल रे कथा यहीं पर रूक
पहाड़ों के शिखरों पर रूक,
सपनों के सांसों पर रूक
घर के कोनों पर रूक।
हाथ आयी धूप के किनारे रूक
पास आये क्षणों पर रूक,
चिट्ठियों की सूरत पर रूक
यहाँ नहीं तो कुछ आगे रूक।
* महेश रौतेला