सीतलता तब जानिये, समता रहै समाय।
विष छोड़े निरबिस रहै, सब दिन दूखा जाय।। 5।।
अपने अंदर शीतलता की उपस्थिति तब जानो, जब तन, मन, वचन तथा कर्म समता के आचरण में समाहित हो जाएं।भले ही सभी दिन दुःखों में बीते, परंतु अहंकार रूपी विष को त्यागकर सहज-शीतल बने रहना चाहिए।
सत साहेब जी
સતગુરુ દેવ કી જય પ્રભુ
જય અલખધણી કી પ્રભુ
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