रूप घनाक्षरी
*************
चाहे जान जाये अब, हार मानेंगे ना अब,
सर ना झुके कभी भी, बना रहे अभिमान।
बंदूकों से गोली चले, हौसले दिलों में पले,
जब तक रहे जान, देश का रखेगें मान।
मिट्टी की सोनी सुगंध, मन करती कुंदन,
प्रेम की यहाँ हैं खान, मेरा देश हैं महान।
सदा यस फैला रहे , सारा जग यहीं कहे,
यहाँ - वहाँ हर जहा , होता रहे गुण गान।
उमा वैष्णव
मौलिक और स्वरचित