आज एक काम याद आ गया....
कुछ पुरानी यादें सहेज कर रखी थी कहीं ...
आज पूरे ज़ोर से उसे ढूंढने लगी ...
आलमारी में दराज में सेल्फ में ...
ना जाने कहां कहां तलाशती रही ..
बस ना अपने ही दिल में तलाश ना पाई ..
कैसी थी वो यादें जिसे मैं ढूंढ रही थी ,
इतनी बैचेन होकर तलाश रही थी ,
शरम सी आगई चेहरे पर ,
वो यादें नहीं मेरा पहला आलिंगन था ,
वो मीठी सी एहसास किसी के आने का ,
पर्दे के पीछे से बार बार छुप कर किसी को देखना ,
मेरे लिए धीरे से मेज पर किसी का गुलाब रख जाना,
सबकी नज़रों से छुपा के मेरा गुलाब को चूमना ,
कहां तलाश रही थी मैं उस यादों को ,
वो यादें तो जिंदगी का मरहम है ,,,
आरती की ख्वाहिशों का ताजमहल है ।