कुछ किसान नेता बने दिल्ली के मेहमान ।
पानी बिजली इन्टरनेट दान करें सुल्तान ।।
कुछ अखबारी भूत की सेवा में रत लोग ।
आंदोलन के कारण काटैं छप्पन भोग ।।
टी.वी बहसी के लिए बढ़ा हुआ है रेट ।
ज्ञान धन ने इनका बढ़ा दिया है पेट ।
माइक लेकर कूदते पत्रकार से जीव ।
आंदोलन में जी उठे पहले थे निर्जीव।।
हरे रंग की पाग पर झपटैं जैसे बाज ।
एक हि बाइट दीजिए हमें आज महराज ।
जिनकी है बुद्धि प्रबल खींचि रहे वे माल ।
आंदोलन के आड़ में काटि रहे तर माल ।।
चारो खाने चित्त है अब अपनी सरकार ।
नहिं सूझै अब कैसे होई अपन उबार ।