उदासीया ने खामोशियां का कफन ओढ़ा है ।
हमने खुद को रोने से तर-बतर होते देखा है
काश के कोई झुगनु भी चमक उठे आंखों में ।
पलकों को हमने इसलिए बंद करके रखा है
खुद को हमने संवारा नहीं है अब तक, लेकिन ।
तेरी तस्वीर को हमने आयना बनाकर रखा है
माना कि तु खुद कि नजरों में ख़ुदा है अपना ।
सर झुकने पर तुझे भी इंसान बनते देखा है
हलक से अनलहक उठने की देर है बस काफिर ।
बेबस करने वाले को हमने बेबस होते देखा है
चल ना पायेगा आसानी से राह-ए-वफा में बंदे ।
गिरने वाले को हमने पांव खिंचते हुए देखा है